Tag Archives: वाइन

घर बैठे बनायें रेड वाइन

पिछले ६ माह में मैंने रेड (ग्रेप) वाइन और हार्ड एप्पल साइडर बनाने पर कई प्रयोग किये जो अधिकतर सफल रहे और फलस्वरूप घर पर एक सस्ती, ठीकठाक स्वाद वाली व पूर्णतया जैविक वाइन उपलब्ध हुयी। यदि कानून की बात करें तो स्वयं, परिवार एवं मित्रों के उपभोग के लिये घर पर वाइन बनाना पूर्णतः वैधानिक है, बस इसे बेचा नहीं जा सकता है उसके लिये आबकारी विभाग से लाईसेंस लेने की आवश्यकता होती है। गुणवत्ता के मामले में ये वाइन भारतीय बाजार में उपमब्ध किसी भी रु ३००/७५० मिली और यूरोपियन बाज़ार में उपमब्ध किसी भी ४ यूरो/७५० मिली से सस्ती वाइन से बेहतर होती है। तो आइये जानते हैं इसे बनाने कि अपेक्षाकृत सरल और सुविधाजनक विधि:-

आवश्यक सामग्री: ट्रॉपिकाना १००% रेड ग्रेप जूस (४ लीटर), ताजा अंगूर (२५० ग्राम), चीनी या शहद (४०० ग्राम), एक अच्छी तरह से बंद हो सकने वाला प्लास्टिक का जरीकेन (५ लीटर)
अन्य वैकल्पिक सामग्री: रेड वाइन यीस्ट, वाइन कार्बोय
किण्वन समय: २ से ३ सप्ताह
परिपक्वन समय: २ से ६ माह
तैयार रेड वाइन: ४ लीटर
एल्कोहॉल प्रतिशत: १० से १२ % (विशिष्ट घनत्व द्वारा अनुमानित परिमाण)
लागत: ७० से १०० रु प्रति ७५० मिली लीटर

यहाँ बताई गयी विधि का उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ वाइन नहीं बल्कि सबसे आसानी से बनाई जा सकने वाली औसत वाइन है। अंगूर को मसलकर उससे रस निकालने की झंझट से बचने के लिये एक सरल उपाय है कि बाजार में उपलब्ध परिष्कृत रेड ग्रेप जूस (जैसे ट्रॉपिकाना, रियल, फ्रेशगोल्ड आदि) प्रयोग किया जाय। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि जूस में कोई भी प्रिज़र्वेटिव नहीं मिला हो और अच्छे परिणाम के लिये १००% फ्रूट जूस ही प्रयोग करें। सामान्यतया जूस में १५० से १६० ग्राम प्रति लीटर शर्करा होती है। जबकि किण्वन के फलस्वरूप पर्याप्त मात्रा में एल्कोहॉल बनने के लिये मातृद्रव में शर्करा की मात्रा लगभग २५० ग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए। इसकी आपूर्ति जूस में उपयुक्त मात्रा में चीनी या शहद मिला कर पूरी की जा सकती है। प्रयोग में लाई जाने वाली सभी वस्तुओं की सफाई का ध्यान देने की विशेष आवश्यकता होती है। इसके लिये पूरे प्रक्रम में केवल स्वच्छ जल (आर. ओ. वाटर यदि उपलब्ध हो तो) प्रयोग में लायें। सर्वप्रथम सभी बर्तनों को गर्म पानी से धो लें। तत्पश्चात ४ लीटर जूस और ४०० ग्राम चीनी या शहद को ५ ली के प्लास्टिक के जरीकेन में डालकर अच्छी तरह से हिलाए ताकि शर्करा भली भाँति घुल जाय। शहद यद्यपि चीनी से महंगा होता है परन्तु अपेक्षाकृत बेहतर वाइन बनाता है। अब इसमें यदि उपलब्ध हों तो वाइन यीस्ट अथवा कुछ ताजे धुले हुये अंगूर मसलकर कर दाल दें और एक बार फिर से अच्छी तरह से हिलायें। अंगूर की खाल में जंगली यीस्ट होता है जो कि रस के किण्वन में भाग लेता है। इसके बाद जरीकेन को अच्छी तरह से बंद कर दें ताकि हवा अंदर न जा सके; साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि किण्वन के फलस्वरूप बनाने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड धीरे धीरे रिस कर बाहर निकल सके। किण्वन के लिये उपयुक्त तापमान १८ से २४ डिग्री सेंटीग्रेड होता है अतः पात्र को अँधेरे व ठन्डे स्थान पर किण्वन के लिये रख दें। २ से ४ दिन के भीतर किण्वन शुरू हो जाता है और कार्बन डाई ऑक्साइड के बुलबुले और द्रव सतह पर उपस्थित झाग देखा जा सकता है। हर २-३ दिन में पात्र का अवलोकन करते रहें और यह सुनिश्चित कर लें कि कार्बन डाई ऑक्साइड गैस बाहर निकल पा रही है। करीब ३ सप्ताह में गैस के बुलबुले दिखना बंद हों जाते हैं और उसके करीब १ सप्ताह बाद यानि कुल १ माह के बाद प्राथमिक किण्वन संपन्न हो जाता है। अब वाइन को प्लास्टिक के पात्र से साइफन द्वारा निकाल कर (ताकि नीचे बैठा अवसाद विचलित न हो) काँच की बोतलों में परिपक्वन के लिये रखा जा सकता है। किण्वन के दौरान बना एल्कोहॉल परिपक्वन के समय वाइन में बची शर्करा व अन्य अवयवों से घुल मिलकर एक अच्छी वाइन को जन्म देता है। परिपक्वन के लिये भी सामान ठन्डे और अँधेरे वातावरण का प्रयोग करना चाहिए। परिपक्वन का समय न्यूनतम २ माह से अधिकतम ६ माह तक हो सकता है। इससे अधिक समय तक परिपक्वन से वाइन के ऑक्सीकरण का खतरा रहता है जिसके फलस्वरूप वाइन सिरके (Vinegar) में परिवर्तित होने लगती है और पीने योग्य नहीं बचती। नीचे दिए गए चित्र में किण्वन पात्र और परिपक्वन के रखी गयी बोतलें देखी जा सकती हैं।

किण्वन और परिपक्वन के पश्चात तैयार वाइन के उपभोग से पूर्व एक और गुणवत्ता परीक्षण की आवश्यकता है। सर्वप्रथम इसे सूंघकर देखें कि इसमें से वाइन की ही महक आ रही है अन्य कोई तीखी, आपत्तिजनक या सड़न की नहीं। यदि सब ठीक है तो फिर इसका स्वाद लेकर देखें। सामान्यतः होने वाली कमियों में से प्रमुख हैं वाइन का अधिक मीठा होना, अधिक खट्टा होना या खराब स्वाद होना। वाइन अधिक मीठी होने का कारण है किण्वन पूरा होने से पूर्व ही यीस्ट निष्क्रिय हों जाना, इस वाइन को पीने योग्य बनाने के लिये इसमें स्वच्छ जल मिलायें। वाइन के खट्टे होने का कारण इसका ऑक्सीकरण है जिससे बचने के लिये सम्पूर्ण प्रक्रम में वाइन के वायु से संपर्क को न्यूनतम रखना चाहिए। स्वाद खराब होने का अर्थ है कि किण्वन के दौरान यीस्ट के अतिरिक्त अन्य बैक्टीरिया भी पनपने लगा है, इससे बचने कि लिये सफाई का विशेष ध्यान रखने की जरूरत होती है।

स्वादिष्ट पकवान बनाने की भाँति ही वाइन बनाना भी एक कला है जिसमें महारथ पाने के लिये कई प्रयोग और सतत रूचि एवं विश्वास की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार रेसेपी पढ़ कर सभी लोग एक बार में शेफ नहीं बन जाते उसी प्रकार वाइन बनाने में भी पारंगत पाने के लिये कई प्रयास करने होते हैं। सफलता की कुंजी हैं रूचि, लगन और विश्वास। इसी विधि के प्रयोग से अन्य बिना खट्टे (non-citrus) फलों जैसे सेब, नाशपाती, आलूबुखारा, बेर, आड़ू, लीची इत्यादि की वाइन भी बनाई जा सकती है।

यदि सबकुछ ठीकठाक रहा तो आपकी पहली वाइन आपको मुबारक। 🙂

6 टिप्पणियाँ

Filed under मदिराओं के प्रकार

मदिरा की उचित मात्रा

एक बार में परोसी जाने वाली मदिरा की मात्रा कई बातों पर निर्भर करती है जैसे मदिरा का प्रकार, प्रयोजन, भौगोलिक वातावरण, सरकारी विनियम और स्वास्थ्य। साधारण तौर पर एक बार में दी जाने वाली मदिरा, जिसे एक यूनिट या एक सर्विंग कहते हैं, में 25 मिली लीटर से अधिक शुद्ध एल्कॉहल नहीं होना चाहिये। इस हिसाब से एक यूनिट में लगभग 500 मिली लीटर बियर (5% ABV1), 200 मिली लीटर वाइन (12.5% ABV) और 60 मिली लीटर आसवित मदिरा जैसे व्हिस्की, वोडका, ब्रांडी आदि (43% ABV) आती है। अमेरिका में एक यूनिट मदिरा में 0.6 आउन्स (17.75 मिली लीटर) एल्कॉहल होना चाहिये जबकि इंगलैंड में यह सीमा 10 मिली लीटर है। भारत में एक यूनिट, जिसे पेग (peg) भी कहा जाता है, में 20 मिली लीटर एल्कॉहल होता है अर्थात 350 मिली लीटर बीयर (8% ABV), 160 मिली लीटर वाइन और 45 मिली लीटर आसवित मदिरा। सामान्यतः शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ्य व्यक्ति दिन में 1 से 2 यूनिट मदिरा बिना किसी खास दुष्प्रभाव के पी सकता है।

__________

1ABV == Alcohol by Volume, एल्कॉहल का आयतन प्रतिशत

3 टिप्पणियाँ

Filed under गैर वर्गीकृत

सुरा या मीड (Mead)

शहद से बनी मदिरा को सुरा या मीड (Mead) कहते हैं। क्योंकि शहद सम्भवत: मानव को ज्ञात प्रथम संतृप्त शर्करा स्रोत था अतः सुरा भी मानव द्वारा बनायी गयी सम्भवतः प्रथम मदिरा थी। ॠगवेद से लेकर प्राचीन यूनानी सभ्यताओं में इसका उल्लेख मिलता है। जहाँ प्राचीन काल में लगभग सभी सभ्यताओं में यह बहुत प्रचलित थी वहीं आज इसका चलन बहुत ही कम केवल नाम मात्र को रह गया है। इसका एक कारण शहद की प्रचुर मात्रा में अनुपलब्धता भी है। आज अधिकतर लोग इसे घर में ही बनाते हैं जोकि अपेक्षाकृत काफी सरल भी है। इसे बनाने के लिये शहद को पानी में घोलकर इसका किण्वन कराते हैं और अक्सर स्वाद वृद्धि के लिये इसमें मसाले और कुछ फल मिलाये जाते हैं। यह एक प्रकार की वाइन ही है जिसमें एल्कॉहल 10 से 18 प्रतिशत तक हो सकता है।

घर पर सुरा बनाने की विधि

आवश्यक सामग्री: शहद (2 कप), मीड यीस्ट (1 चम्मच), शुद्ध जल (8 कप), नींबू (2 नींबू का रस), स्वादानुसार मसाले (अदरक, लौंग, इलाइची, दालचीनी, जायफल आदि)

सर्वप्रथम मीड या वाइन यीस्ट को 1/4 कप शहद, 1 कप शुद्ध जल और 2 नींबू के रस के मिश्रण में अच्छी तरह से मिलाकर किसी बड़े मुँह के जार में 24 घंटे के लिये छोड़ दें। जार को बन्द न करें केवल किसी साफ कपड़े से ढक दें। ऐसा करने से यीस्ट ऑक्सीजन की उपस्थिति में अपनी जनसंख्या बढ़ाता है और नींबू का रस अम्लीय वातावरण बनाता है ताकि अन्य बैक्टीरिया न पनप सकें। अगले दिन शेष शहद और पानी को मिलाकर उबालें और अच्छी तरह से मिलने दें। ऊपर आये झाग को हटाते रहें इसमें शहद में उपस्थित वैक्स होता है। जब यह मिश्रण बिल्कुल साफ हो जाय इसे ठंडा होने दें। अब इसमें यीस्ट का मिश्रण और स्वादानुसार मसाले मिलाकर किण्वन के लिये विशिष्ट वाइन कारबॉय में रख दें। इस जार में ऐसी व्यवस्था होती है कि किण्वन के समय बनने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड गैस तो इससे बाहर निकलती रहती है परन्तु बाहर की ऑक्सीजन अन्दर नहीं जा पाती। ऑक्सीजन की उपस्थिति में यीस्ट एल्कॉहल नहीं बनाता है। 2 से 3 माह में किण्वन पूरा हो जाता है।

विस्तार में जानकारी के इस लिंक पर जायें।

5 टिप्पणियाँ

Filed under मदिराओं के प्रकार

वाइन टेस्टिंग (Wine Tasting)

भोजन का मुख्य उद्देश्य यद्यपि क्षुधा निवारण ही होता है फिर भी स्वादिष्ट भोजन का अनुभव और उसे ग्रहण करने का एक तरीका होता है। यह बात वैज्ञानिक रूप से सत्यापित है कि यदि भोजन की सुगन्ध और स्वाद लेते हुये उसका भोग किया जाय तो सुपाच्य होता है। इसी प्रकार वाइन का रसास्वादन या वाइन टेस्टिंग भी वर्षों में विकसित एक तरीका है जिससे किसी भी वाइन या अन्य मदिरा का पूर्ण आनन्द उठाया जा सकता है। इस बात का कोई नियम नहीं है कि कौन सा स्वाद अच्छा या बुरा है क्योंकि स्वाद एक व्यक्तिगत आंकलन और निर्णय होता है। परन्तु स्वाद का पूर्ण अनुभव लेने के लिये एक मानक विधि होती है जिसमें वाइन के रसास्वादन के समय ध्यान देने योग्य चीजों और कुछ सूचक स्वादों के बारे में बताया जाता है। प्रस्तुत है इस विधि के बारे में एक संक्षिप्त जानकारी।

वाइन टेस्टिंग को चार भागों में बाँटा जा सकता है। रंग का आंकलन, पीने से पूर्व सुगन्ध का अनुभव, मुँह में स्वाद का अनुभव और निगलने के बाद मुँह का स्वाद। इन चारों मिला जुना अनुभव पी जाने वाली वाइन का पूर्ण स्वाद नियत करता है। वाइन का सबसे अच्छा स्वाद लेने हेतु उसका तापमान वातावरण के ताप से थोड़ा कम लगभग 5 से 18oC के बीच होना चाहिये। अक्सर वाइन टेस्टिंग सत्रों में लोग वाइन को निगलते नहीं हैं, स्वाद लेने के बाद थूक देते हैं ताकि उनका वाइन के स्वाद के बारे में निर्णय वाइन से होने वाले नशे से प्रभावित न हो। एक बार स्वाद निर्धारण के बाद अपनी पसंदीदा वाइन का आराम से लुत्फ़ उठाया जा सकता है।

वाइन का रंग दर्शन: सबसे पहले 100-150 मिली लीटर वाइन को उपयुक्त गिलास में निकालते हैं। उसके बाद उसे गिलास में थोड़ा हिलाकर उसके रंग, पारदर्शिता और गाढ़ेपन की परख करते हैं। यदि यह रेड वाइन है तो इसका रंग मरून, सुर्ख लाल, जामुनी, भूरा लाल, या ईंट के रंग सा हो सकता है। यदि यह व्हाइट वाइन है तो इसका रंग हल्का पीला, हल्का हरा, हल्का अम्बर या पूर्णतया रंगहीन हो सकता है। रंग का सर्वोत्तम परीक्षण सफेद पृष्ठभूमि पर होता है, इसलिये गिलास को सफेद टेबल क्लाथ, या नैपकिन के आगे रखकर देखा जाना चाहिये। रंग से वाइन बनाने में प्रयुक्त अंगूर की किस्म, वाइन की उम्र और उसके परिपक्वन के बारे में अनुमान लगाया जाता है। हैवी वाइन जिसमें सामान्यतः एल्कॉहल, एसिड, टैनिन और/या अर्क अधिक मात्रा में होते हैं, का रंग गहरा होता है। मीठी वाइन की श्यानता अधिक होने की वजह से गिलास में उसे हिलाने पर वह गिलास की दीवारों पर अधिक देर से फिसलती है। समय के साथ सामान्यतया सभी वाइन की पारदर्शिता / निर्मलता बढ़ती है।

वाइन की सुगन्ध: वाइन की सुगन्ध लेने का सही तरीका है कि गिलास के मुँह के पास नाक ले जाकर एक लम्बी साँस ली जाय। वाइन की सुगन्ध या अरोमा (aroma) से ओक, बेरी, फूलों, वनीला, खट्टेपन की मिली जुली महक आती है जो वाइन के स्वाद का एक महत्त्वपूर्ण पूरक अंग होता है। सुगन्ध के सभी अवयवों को परखने के लिये अक्सर कई बार वाइन की सुगन्ध ली जाती है।

वाइन का स्वाद: सुगन्ध लेने के बाद वाइन का एक छोटा घूंट मुँह में लेकर उसे जीभ की सहायता से मुँह में अच्छी तरह से हिलाते हैं जिससे कि जीभ की स्वाद संवेदी कोशिकाओं को स्वाद आंकलन के लिये उचित समय मिल सके। स्वाद संवेदन को दो चरण में बाँटा जा सकता है। प्रथम चरण, जिसे आक्रमण चरण (Attack Phase) कहते है, में वाइन की एल्कॉहल मात्रा, खट्टापन और मिठास का अनुभव होता है। एक संतुलित वाइन में इनमें से कोई भी स्वाद दूसरों पर हावी नहीं होना चाहिये। इस चरण में वाइन की जटिलता (complexity) और तीव्रता (intensity) के बारे में पता चलता है। जैसे कि वाइन लाइट है या हैवी, मीठी है या शुष्क, कड़क है या मुलायम आदि परन्तु इस चरण में वाइन मे से फलों या मसालों का स्वाद आना जरूरी नहीं है। दूसरे चरण, जिसे विकास चरण (Evolution Phase) कहते हैं, में वाइन का वास्तविक स्वाद पता चलता है। रेड वाइन में बेर, आलूबुखारा, अञ्जीर आदि फलों और कालीमिर्च, लौंग, दालचीनी आदि मसालों या ओक और देवदार की लकड़ी और धुँए की महक का अनुभव मिल सकता है। जबकि व्हाइट वाइन में सेब, नाशपाती, और खट्टे फलों के स्वाद के साथ शहद, मक्खन और जड़ी बूटियों का अनुभव मिल सकता है। इसके बाद वाइन को निगल या थूक देते हैं।

वाइन पीने के बाद मुँह का स्वाद: ये वह चरण है जब वाइन का स्वाद अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है। इसमें यह देखा जाता है कि निगलने के बाद कितनी देर तक वाइन का स्वाद मुँह में रहता है। क्या वाइन लाइट बॉडी थी (जैसे पानी) या फिर हैवी बॉडी (जैसे दूध जैसी गाढ़ी)? क्या वाइन का स्वाद अभी भी मुँह के पिछले भाग और गले में लिया जा सकता है? क्या स्वाद देर तक मुँह में रहा या फिर कुछ पल के लिये ही रहा? वाइन की अन्तिम छाप क्या थी – फल, मक्खन या ओक? और सबसे महत्त्वपूर्ण क्या आप दूसरा घूँट लेना चाहते हैं या फिर वाइन अधिक कड़वी थी?

अन्त में इस बात का निर्धारण किया जाता है कि वाइन ने आप पर क्या छाप छोड़ी? कुल मिलाकर आपको वाइन कैसी लगी? वाइन का खट्टापन जो उसमें उपस्थित सिरके के कारण होता है, कितना था? क्या वाइन संतुलित थी? और किस प्रकार के भोजन के साथ यह अच्छी लगेगी?

इंटरनेट पर ऐसे कई लिंक ढूँढे जा सकते हैं जिसमें वाइन और भारतीय व्यंजनों के मेल के बारे में वर्णन है।

1 टिप्पणी

Filed under गैर वर्गीकृत

ब्रांडी (Brandy)

ब्रांडी को वाइन के आसवन से बनाया जाता है अर्थात ब्रांडी का मुख्य मूल स्रोत अंगूर का रस है। इसमें एल्कॉहल प्रतिशत 36-60% तक होता है और यह डीजेस्टीफ़[1] (digestif) के रूप में ली जाती है। सामान्यतः ब्रांडी का परिपक्वन नहीं किया जाता, यदि किया भी जाता है तो अपेक्षाकृत कम समय के लिये। ब्रांडी के प्रमुख उत्पादक देशों में पश्चिमी यूरोप के देश आते हैं जैसे फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, जर्मनी, इटली आदि। इसके अलावा अमेरिका (कैलिफ़ोर्निया), दक्षिण अफ्रीका, अर्मेनिया, बुल्गारिया, मैक्सिको और साइप्रस भी ब्रांडी का उत्पादन करते हैं। भारत में भी ब्रांडी के गिने चुने ब्राँड उपलब्ध हैं – हनी बी ब्रांडी, डॉक्टर्स ब्रांडी आदि। अंगूर के अलावा किसी अन्य फल के रस से बनी ब्रांडी को फ्रूट ब्रांडी या उस फल के नाम की ब्रांडी कहते हैं जैसे – कोकोनट ब्रांडी, एप्पल ब्रांडी आदि। इसके अलावा फलों के छिलकों और रस निकालने के बाद बचे गूदे जिसे पामेस (pomace) कहते हैं, से भी ब्रांडी बनाई जाती है।

अंगूर से निर्मित ब्रांडी के प्रकार: उत्पादन क्षेत्र के आधार पर यूरोप की तीन सर्वप्रसिद्ध ब्रांडी हैं –

कोनयाक (Cognac): फ्रांस के कोनयाक क्षेत्र में निर्मित ब्रांडी को कोनयाक कहते हैं। इसके प्रमुख ब्राँड्स हैं – हाइन (Hine), मारटेल (Martell), रेमी मार्टिन (Rémy Martin), हेनेसी (Hennessy), रेनॉ सबोरिन (Ragnaud-Sabourin), डेलामेन (Delamain) और करवाइज़र (Courvoisier)।

आर्मनयाक (Armagnac): दक्षिण पश्चिमी फ्रांस के आर्मनयाक इलाके के अंगूर से निर्मित ब्रांडी को आर्मनयाक कहते हैं। इसके प्रमुख ब्राँड्स हैं – डेरॉज़ (Darroze), बैरॉन डी सिगॉनयाक (Baron de Sigognac), लैरेसिंगल (Larressingle), डेलॉर्ड (Delord) और जानॉ (Janneau)।

ब्रांडी डि जारेज़ (Brandy de Jerez): दक्षिणी स्पेन के जारेज़ क्षेत्र में बनी ब्रांडी को ब्रांडी डि जारेज़ कहते हैं। इसे स्पेन की प्रसिद्ध फोर्टीफाइड वाइन, शेरी (Sherry) बनाने के लिये भी प्रयोग में लाया जाता है।

फ्रूट ब्रांडी के प्रकार:

ओ-डी-वी (Eau-de-vie): सामान्य फ्रेंच फ्रूट ब्रांडी
केल्वाडोस (Calvados): सेब से बनी एक फ्रेंच ब्रांडी
कोकोनट ब्रांडी: नारियल पानी या उसके पेड़ से निकाले रस से निर्मित ब्रांडी
जर्मन श्नाप्स (Schnaps): जर्मनी और ऑस्ट्रिया की फ्रूट ब्रांडी
कीर्शवासर (Kirschwasser): जर्मनी, स्विटज़रलैंड और फ्रांस में चेरी से बनी ब्रांडी
इसके अलावा लगभग सभी यूरोपीय देशों में फलों की ब्रांडी की एक विशिष्ट किस्म पायी जाती है।

पामेस (Pomace) ब्रांडी: इटली की ग्रापा (Grappa), फ्रांस की मार्क (Marc) और जॉर्जिया की चा-चा (Chacha) प्रसिद्ध पामेस ब्रांडी हैं।

इसके अलावा ब्रांडी के लेबल पर ए सी (A C), वी एस (V S), वी एस ओ पी (V S O P), एक्स ओ (X O) या विंटेज (Vintage) लिखा होता है जिनका मतलब है –
ए सी (A C): दो साल परिपक्वित
वी एस (V S): “वेरी स्पेशल” या थ्री स्टार, तीन साल परिपक्वित
वी एस ओ पी (V S O P): “वेरी स्पेशल ओल्ड पेल” या फाइव स्टार, पाँच साल परिपक्वित
एक्स ओ (X O): “एक्सट्रा ओल्ड”, सामान्यतः छः साल परिपक्वित
विंटेज (Vintage): अंकित विंटेज वर्ष के अंगूरों से निर्मित और बोतल बन्द होने तक परिपक्वित

ब्रांडी

ब्रांडी

__________

[1] डीजेस्टीफ़ (digestif) एक फ़्रेंच शब्द है जिसका मतलब है भोजन के पश्चात पिया जाने वाला एल्कॉहलिक पेय या पाचन बढ़ाने वाली मदिरा। इसके विपरीत भोजन से पूर्व लिये जाने वाले एल्कॉहलिक पेय को अपेरेटीफ़ (aperitif), या भूख बढ़ाने वाली मदिरा कहते हैं।

2 टिप्पणियाँ

Filed under मदिराओं के प्रकार

वाइन (Wine)

वाइन मुख्यतः अंगूर के रस के किण्वन से बनाई जाती है। अन्य फलों के रस से बनाई गयी वाइन को सामान्यतया फ़्रूट वाइन, कन्ट्री वाइन या फल के नाम पर वाइन बोला जाता है जैसे एप्पल वाइन, प्लम वाइन इत्यादि। बियर की भाँति ही वाइन भी एक अनासवित मदिरा है, परन्तु कुछ प्रकार की वाइन में कुछ मात्रा में आसवित स्प्रिट ब्राण्डी मिलाई जाती है जिससे कि वाइन का किण्वन रुक जाता है और उसमें एल्कॉहल का प्रतिशत भी बढ़ जाता है। इस प्रकार की वाइन को दृढ़ीकृत वाइन या फ़ोर्टीफ़ाइड वाइन कहते हैं। पोर्ट वाइन (पुर्तगाल) , शेरी (स्पेन), वरमूथ (Vermouth, इटली), मदीरॉ (Madeira, पुर्तगाल) और जिंजर वाइन (इंगलैंड) प्रमुख फ़ोर्टीफ़ाइड वाइन हैं। ये स्वाद में मीठी होती हैं इसलिये इन्हें डेज़र्ट वाइन भी कहते हैं। सभी प्रकार की वाइन मुख्यतः खाने के साथ, उसके पहले या बाद में पी जाती हैं। इसके अलावा कुछ प्रकार की वाइन में कार्बन डाई ऑक्साइड की सार्थक मात्रा होती है इन्हें स्पार्कलिंग वाइन कहते हैं। इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड बियर की भाँति किण्वन के फलस्वरूप प्राकृतिक रूप से भी हो सकती है और कृत्रिम रूप से भी डाली गयी हो सकती है। शैम्पेन (Champagne) एक प्रसिद्ध स्पार्कलिंग वाइन है जो कि फ्रांस के शैम्पेन इलाक़े में बनती है।

वाइन भी एक ऐतिहासिक मदिरा है। इस्राइल, ज्योर्जिया, इरान, चीन, यूनान और मिस्र देशों में 6000 वर्ष ईसा पूर्व भी इसके बनाये जाने के प्रमाण मिले हैं। पुराकाल से ही वाइन उत्सव, शुभ कार्य और सामूहिक भोज का अटूट अंग रहा है। प्राचीन काल के बहुत से धार्मिक संस्थान (मुख्यतः चर्च) भी वाइन पीने को बढ़ावा देते थे और उन्होंने बियर पीना निषिद्ध कर रखा था क्योंकि ये बर्बर लोगों का पेय माना जाता था जबकि वाइन सभ्य लोगों का। वैसे वाइन और बियर के प्रशंसकों के बीच यह घमासान अभी तक चला आ रहा है। फ्रांस आज एक प्रमुख वाइन उत्पादक देश है, इसके अलावा इटली, स्पेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया भी विश्व भर में अच्छी मात्रा में वाइन निर्यात करते हैं।

वाइन में एल्कोहल का प्रतिशत 9 से 30% तक हो सकता है, परन्तु साधारणतः सामान्य वाइन में 12-15% और फ़ोर्टीफ़ाइड वाइन में 20-25% तक एल्कॉहल होता है। वाइन का नामांकन उसके बनने के स्थान या उसे बनाने में प्रयुक्त अंगूर की किस्म पर किया जाता है। यदि किसी वाइन में 75% से अधिक एक ही किस्म का अंगूर प्रयुक्त होता है तो उसे वेराइटल वाइन कहते हैं जैसे मर्लो (Merlot), कैबर्ने सोवेन्यों (Cabernet Sauvignon), शार्डने (Chardonnay), पिनॉ नोआर (Pinot noir) इत्यादि। इसके विपरीत मिश्रित या ब्लेंडेड वाइन में कई किस्म के अंगूर प्रयुक्त होते हैं और इन्हें मुख्यतः इनके बनने के स्थान के नाम से जाना जाता है जैसे बोर्डो (Bordeaux), शॉटो (Chateau) इत्यादि। विंटेज वाइन एक ही मौसम के अंगूर से बनाई जाती हैं और उन पर वह वर्ष अंकित होता है।

साधारण भाषा में वाइन के रंग के आधार पर इन्हें रेड वाइन रोज़ वाइन और व्हाइट वाइन में बाँटा जाता है। वाइन एक महँगी मदिरा है, भारतीय वाइन की एक बोतल (750 ml) 200 रूपये से 1,000 रुपये तक होती है जबकि आयातित वाइन 600 रुपये से लेकर 5,000 रुपये या उससे भी महँगी हो सकती है।

10 टिप्पणियाँ

Filed under मदिराओं के प्रकार

मदिरा – 101

अंग्रेजी में विभिन्न प्रकार की मदिराओं के अलग अलग नाम हैं जबकि हिन्दी में सामान्यतः सभी प्रकार की मदिराओं को मदिरा, शराब, सुरा, सोमरस, मद्य, दारू या चालू भाषा में ठर्रा और न जाने क्या क्या कहा जाता है। इन सभी का शाब्दिक अर्थ है एल्कोहल युक्त मादक पेय या अंग्रेजी में कहें तो एल्कोहलिक बेवेरेज (alcoholic beverages)। सभी प्रकार की मदिराओं को दो अवयवों में विभाजित कर सकते हैं एक एल्कोहल जिससे नशा होता है और दूसरा उसके अन्य तत्व जोकि उसकी स्वाद, सुगन्ध, रंग और पौष्टिकता के लिये जिम्मेदार होते हैं। सरलता के लिये हिन्दी में भी हम सभी प्रकार की मदिराओं के लिये प्रयुक्त अंग्रेजी शब्दों का ही प्रयोग करेंगे। इससे पहले कि हम आगे बढ़ें कुछ तकनीकी शब्दों को जान लें। सभी प्रकार की मदिरायें किण्वन या फ़र्मन्टेशन नाम की जैविक क्रिया से बनायी जाती हैं यही क्रिया सिरका और खमीर बनाने के लिये भी उत्तरदायी है। इस क्रिया से प्रयुक्त मूल पदार्थ में उपस्थित कार्बोहाइड्रेट, स्टार्च इत्यादि के क्षरण से एल्कोहल बनता है और कार्बन डाई ऑक्साइड गैस निकलती है। अधिकतर मदिराओं के उत्पादन में जो दूसरी जैव-रासायनिक क्रिया प्रयुक्त होती है उसे कहते हैं परिपक्वन या एजिंग। इस क्रिया में किण्वन के बाद प्राप्त मदिरा को किसी विशेष प्रकार के पात्र में एक नियत ताप पर कुछ समय (कभी कभी कई वर्षो तक) के लिये रखकर उसके स्वाद, सुगन्ध व पौष्टिकता में वृद्धि की जाती है। इसके अलावा किण्वन के पश्चात प्राप्त; मातृ-द्रव के शोधन के लिये आसवन या डिस्टिलेशन का प्रयोग करते हैं। तो आइये जानते हैं कि विश्व में कौन कौन सी प्रसिद्ध मदिरायें पायी जाती हैं उनका स्रोत और कुछ अन्य अनूठी बातें। सभी प्रकार की मदिराओं को मुख्यतः तीन भागों में बाँट सकते हैं बियर, वाइन और स्प्रिट। बियर और वाइन में अपेक्षाकृत कम एल्कोहल होता है, इनका आसवन नहीं किया जाता और ये बिना कुछ मिलाये पी जाती है जबकि स्प्रिट में अधिक एल्कोहल होने के कारण इसमें पानी, सोडा, फलों का रस या कोल्ड ड्रिंक मिला कर पीते हैं।

बियर (Beer): बियर मुख्यतः जौ, गेहूँ, मक्का इत्यादि अनाजों के अधूरे किण्वन और बहुत कम समय (1-2 सप्ताह) के परिपक्वन से बनायी जाती है। किण्वन और परिपक्वन के समय निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड की वजह से बियर एक प्राकृतिक रूप से कार्बोनेटेड पेय है। इसमें एल्कोहल प्रतिशत 3 से 30% तक हो सकता है। परन्तु सामान्यतया लाइट बियर में 4% और स्ट्रॉंग बियर में 8% एल्कोहल होता है। जर्मन बियर सबसे प्रसिद्ध हैं। भारत में किंगफ़िशर, हेवर्ड 5000, फ़ोस्टर, गोल्डन ईगल इत्यादि ब्रान्ड्स बाज़ार में उपलब्ध हैं। विभिन्न प्रदेशों मे कर भिन्नता के कारण 650 ml की बोतल का दाम 40 से 90 रुपये तक होता है। बियर के बारे और जानकारी एक अलग पोस्ट में।

वाइन (Wine): वाइन मुख्यतः फलों के रस (अधिकतर अंगूर) के पूरे किण्वन और परिपक्वन से बनाई जाती है। इसमें एल्कोहल का प्रतिशत 9 से 18% तक हो सकता है। फ्रांस एक प्रमुख वाइन उत्पादक देश है, इसके अलावा इटली, स्पेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया भी विश्व भर में अच्छी मात्रा में वाइन निर्यात करते हैं। वाइन का नामांकन उसे बनाने में प्रयुक्त अंगूर के प्रकार पर किया जाता है, जैसे मर्लो (Merlot), कैबर्ने सोवेनॉन (Cabernet Sauvignon), शार्डना (Chardonnay), पिनॉ नोआर (Pinot noir) इत्यादि। साधारण भाषा में वाइन के रंग के आधार पर इन्हें रेड वाइन और व्हाइट वाइन में बाँटा जाता है। बियर की ही भाँति वाइन का भी आसवन नहीं किया जाता है। वाइन एक महँगी मदिरा है, भारतीय वाइन की एक बोतल (750 ml) 300 रूपये से 1,000 रुपये तक होती है जबकि आयातित वाइन 600 रुपये से लेकर 5,000 रुपये या उससे भी महँगी हो सकती है। वाइन के बारे में और अधिक जानकारी आगे आने वाली पोस्ट में।

व्हिस्की (Whisky): व्हिस्की मुख्यतः जौ, गेहूँ, मक्का इत्यादि अनाजों के पूरे किण्वन, आसवन और परिपक्वन द्वारा बनाई जाती है। इसमें एल्कॉहल प्रतिशत 30 से 65% तक हो सकता है, परन्तु सामान्यतया यह 43% होता है। स्कॉटलैंड एक प्रमुख व्हिस्की उत्पादक देश है और वहाँ पर बनाई गयी व्हिस्की को स्कॉच (Scotch) कहते हैं, इसके अलावा आयरलैंड और अमेरिका भी व्हिस्की के प्रमुख उत्पादक हैं। जो व्हिस्की अंकुरित अनाज से बनाई जाती है उसे माल्ट व्हिस्की कहते हैं और यह अपेक्षाकृत अच्छी और महँगी होती है। बिना अंकुरण के अनाज से बनाई जाने वाली व्हिस्की को ग्रेन व्हिस्की कहते हैं। सामान्यतः कई व्हिस्की को मिलाकर मिश्रित या ब्लेंडेड व्हिस्की के रूप में बेचा जाता है। व्हिस्की की गुणवत्ता और दाम उसके परिपक्वन के समय और एकल या मिश्रित प्रकार पर निर्भर करते हैं। भारत में निर्मित ग्रेन व्हिस्की की एक बोतल (750 ml) का दाम 200 रुपये से 1000 रुपये तक होता है जबकि एक आयातित 21 वर्ष पुरानी स्कॉच का दाम 4,000 रुपये 10,000 रुपये या और अधिक हो सकता है। व्हिस्की के बारे में और अधिक जानकारी अगले पोस्ट में।

ब्रान्डी (Brandy): ब्रान्डी को वाइन के आसवन से बनाया जाता है। इसमें 36-60% तक एल्कॉहल होता है। इसका उत्पादन भी मुख्यतः यूरोपीय देशों मे ही होता है।

रम (Rum): रम गन्ने के रस या शीरे (molasses) के किण्वन और आसवन से बनायी जाती है। इसमें भी 40 से 70% तक एल्कॉहल होता है। प्रमुख उत्पादकों मे कैरेबियन और दक्षिण अमेरिकी देश आते हैं।

वोडका (Vodka): वोडका को आलू से निकाली गयी स्टार्च के किण्वन और आसवन से बनाते हैं। इसमें 40-60% तक एल्कॉहल होता है। इसके प्रमुख उत्पादक देश रूस, रोमानिया, पोलैंड और अन्य पूर्वी यूरोपीय देश हैं।

इसके अतिरिक्त जिन (Gin), ताड़ी (Toddy) जोकि नारियल और ताड़ के पेड़ से निकाली जाती है, फ़ेनी (Fenny) जोकि मुख्यतः गोवा में काजू से बनाई जाती है, टक़ीला (Tequila) जोकि मैक्सिको में अगेव नामक पौधे से बनाई जाती है, साके (Sake) जोकि जापान में चावल से बनाई जाती है इत्यादि अन्य प्रमुख मदिरायें है जो कि विश्व के विभिन्न भागों में प्रचलित हैं।

टिप्पणी करे

Filed under मदिराओं के प्रकार