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घर बैठे बनायें रेड वाइन

पिछले ६ माह में मैंने रेड (ग्रेप) वाइन और हार्ड एप्पल साइडर बनाने पर कई प्रयोग किये जो अधिकतर सफल रहे और फलस्वरूप घर पर एक सस्ती, ठीकठाक स्वाद वाली व पूर्णतया जैविक वाइन उपलब्ध हुयी। यदि कानून की बात करें तो स्वयं, परिवार एवं मित्रों के उपभोग के लिये घर पर वाइन बनाना पूर्णतः वैधानिक है, बस इसे बेचा नहीं जा सकता है उसके लिये आबकारी विभाग से लाईसेंस लेने की आवश्यकता होती है। गुणवत्ता के मामले में ये वाइन भारतीय बाजार में उपमब्ध किसी भी रु ३००/७५० मिली और यूरोपियन बाज़ार में उपमब्ध किसी भी ४ यूरो/७५० मिली से सस्ती वाइन से बेहतर होती है। तो आइये जानते हैं इसे बनाने कि अपेक्षाकृत सरल और सुविधाजनक विधि:-

आवश्यक सामग्री: ट्रॉपिकाना १००% रेड ग्रेप जूस (४ लीटर), ताजा अंगूर (२५० ग्राम), चीनी या शहद (४०० ग्राम), एक अच्छी तरह से बंद हो सकने वाला प्लास्टिक का जरीकेन (५ लीटर)
अन्य वैकल्पिक सामग्री: रेड वाइन यीस्ट, वाइन कार्बोय
किण्वन समय: २ से ३ सप्ताह
परिपक्वन समय: २ से ६ माह
तैयार रेड वाइन: ४ लीटर
एल्कोहॉल प्रतिशत: १० से १२ % (विशिष्ट घनत्व द्वारा अनुमानित परिमाण)
लागत: ७० से १०० रु प्रति ७५० मिली लीटर

यहाँ बताई गयी विधि का उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ वाइन नहीं बल्कि सबसे आसानी से बनाई जा सकने वाली औसत वाइन है। अंगूर को मसलकर उससे रस निकालने की झंझट से बचने के लिये एक सरल उपाय है कि बाजार में उपलब्ध परिष्कृत रेड ग्रेप जूस (जैसे ट्रॉपिकाना, रियल, फ्रेशगोल्ड आदि) प्रयोग किया जाय। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि जूस में कोई भी प्रिज़र्वेटिव नहीं मिला हो और अच्छे परिणाम के लिये १००% फ्रूट जूस ही प्रयोग करें। सामान्यतया जूस में १५० से १६० ग्राम प्रति लीटर शर्करा होती है। जबकि किण्वन के फलस्वरूप पर्याप्त मात्रा में एल्कोहॉल बनने के लिये मातृद्रव में शर्करा की मात्रा लगभग २५० ग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए। इसकी आपूर्ति जूस में उपयुक्त मात्रा में चीनी या शहद मिला कर पूरी की जा सकती है। प्रयोग में लाई जाने वाली सभी वस्तुओं की सफाई का ध्यान देने की विशेष आवश्यकता होती है। इसके लिये पूरे प्रक्रम में केवल स्वच्छ जल (आर. ओ. वाटर यदि उपलब्ध हो तो) प्रयोग में लायें। सर्वप्रथम सभी बर्तनों को गर्म पानी से धो लें। तत्पश्चात ४ लीटर जूस और ४०० ग्राम चीनी या शहद को ५ ली के प्लास्टिक के जरीकेन में डालकर अच्छी तरह से हिलाए ताकि शर्करा भली भाँति घुल जाय। शहद यद्यपि चीनी से महंगा होता है परन्तु अपेक्षाकृत बेहतर वाइन बनाता है। अब इसमें यदि उपलब्ध हों तो वाइन यीस्ट अथवा कुछ ताजे धुले हुये अंगूर मसलकर कर दाल दें और एक बार फिर से अच्छी तरह से हिलायें। अंगूर की खाल में जंगली यीस्ट होता है जो कि रस के किण्वन में भाग लेता है। इसके बाद जरीकेन को अच्छी तरह से बंद कर दें ताकि हवा अंदर न जा सके; साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि किण्वन के फलस्वरूप बनाने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड धीरे धीरे रिस कर बाहर निकल सके। किण्वन के लिये उपयुक्त तापमान १८ से २४ डिग्री सेंटीग्रेड होता है अतः पात्र को अँधेरे व ठन्डे स्थान पर किण्वन के लिये रख दें। २ से ४ दिन के भीतर किण्वन शुरू हो जाता है और कार्बन डाई ऑक्साइड के बुलबुले और द्रव सतह पर उपस्थित झाग देखा जा सकता है। हर २-३ दिन में पात्र का अवलोकन करते रहें और यह सुनिश्चित कर लें कि कार्बन डाई ऑक्साइड गैस बाहर निकल पा रही है। करीब ३ सप्ताह में गैस के बुलबुले दिखना बंद हों जाते हैं और उसके करीब १ सप्ताह बाद यानि कुल १ माह के बाद प्राथमिक किण्वन संपन्न हो जाता है। अब वाइन को प्लास्टिक के पात्र से साइफन द्वारा निकाल कर (ताकि नीचे बैठा अवसाद विचलित न हो) काँच की बोतलों में परिपक्वन के लिये रखा जा सकता है। किण्वन के दौरान बना एल्कोहॉल परिपक्वन के समय वाइन में बची शर्करा व अन्य अवयवों से घुल मिलकर एक अच्छी वाइन को जन्म देता है। परिपक्वन के लिये भी सामान ठन्डे और अँधेरे वातावरण का प्रयोग करना चाहिए। परिपक्वन का समय न्यूनतम २ माह से अधिकतम ६ माह तक हो सकता है। इससे अधिक समय तक परिपक्वन से वाइन के ऑक्सीकरण का खतरा रहता है जिसके फलस्वरूप वाइन सिरके (Vinegar) में परिवर्तित होने लगती है और पीने योग्य नहीं बचती। नीचे दिए गए चित्र में किण्वन पात्र और परिपक्वन के रखी गयी बोतलें देखी जा सकती हैं।

किण्वन और परिपक्वन के पश्चात तैयार वाइन के उपभोग से पूर्व एक और गुणवत्ता परीक्षण की आवश्यकता है। सर्वप्रथम इसे सूंघकर देखें कि इसमें से वाइन की ही महक आ रही है अन्य कोई तीखी, आपत्तिजनक या सड़न की नहीं। यदि सब ठीक है तो फिर इसका स्वाद लेकर देखें। सामान्यतः होने वाली कमियों में से प्रमुख हैं वाइन का अधिक मीठा होना, अधिक खट्टा होना या खराब स्वाद होना। वाइन अधिक मीठी होने का कारण है किण्वन पूरा होने से पूर्व ही यीस्ट निष्क्रिय हों जाना, इस वाइन को पीने योग्य बनाने के लिये इसमें स्वच्छ जल मिलायें। वाइन के खट्टे होने का कारण इसका ऑक्सीकरण है जिससे बचने के लिये सम्पूर्ण प्रक्रम में वाइन के वायु से संपर्क को न्यूनतम रखना चाहिए। स्वाद खराब होने का अर्थ है कि किण्वन के दौरान यीस्ट के अतिरिक्त अन्य बैक्टीरिया भी पनपने लगा है, इससे बचने कि लिये सफाई का विशेष ध्यान रखने की जरूरत होती है।

स्वादिष्ट पकवान बनाने की भाँति ही वाइन बनाना भी एक कला है जिसमें महारथ पाने के लिये कई प्रयोग और सतत रूचि एवं विश्वास की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार रेसेपी पढ़ कर सभी लोग एक बार में शेफ नहीं बन जाते उसी प्रकार वाइन बनाने में भी पारंगत पाने के लिये कई प्रयास करने होते हैं। सफलता की कुंजी हैं रूचि, लगन और विश्वास। इसी विधि के प्रयोग से अन्य बिना खट्टे (non-citrus) फलों जैसे सेब, नाशपाती, आलूबुखारा, बेर, आड़ू, लीची इत्यादि की वाइन भी बनाई जा सकती है।

यदि सबकुछ ठीकठाक रहा तो आपकी पहली वाइन आपको मुबारक। 🙂

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मदिरा उत्पादन: एक जैव रासायनिक दृष्टिकोण

मदिरा उत्पादन की सबसे महत्त्वपूर्ण और अभिन्न प्रक्रिया है किण्वन या फर्मन्टेशन (fermentation)। इस प्रक्रिया में कुछ कवक, जिन्हें यीस्ट (खमीर) कहते हैं, शर्करा, ग्लूकोज़, फ्रक्टोज़, स्टार्च आदि बड़े अणुओं को वायु की अनुपस्थिति में अपघटित करके एल्कॉहल बनाते हैं। इस प्रक्रिया में कार्बन डाई ऑक्साइड गैस निकलती है जिसे या तो मदिरा से निकल जाने देते हैं या फिर यदि मदिरा को कार्बोनेटेड (सोडे या कोल्ड-ड्रिंक की भाँति) रखना है तो किण्वन पात्र को बन्द करके रखते हैं उदाहरणार्थ बियर और स्पार्कलिंग वाइन में कार्बन डाई ऑक्साइड मिली रहती है। अंगूर की खाल में प्राकृतिक रूप से यीस्ट पाया जाता है जिसे जंगली यीस्ट (wild yeast) कहते हैं। किण्वन से बना एल्कॉहल यीस्ट की सेहत के लिये अच्छा नहीं होता और द्रव में एल्कॉहल के एक नियत प्रतिशत से अधिक हो जाने पर यीस्ट जीवित नहीं रह सकता। यह नियत प्रतिशत बेकिंग यीस्ट के लिये 4 – 6%, अंगूर की खाल में पाये जाने वाले जंगली यीस्ट के लिये 12 – 16% और कुछ विशिष्ट यीस्ट के लिये 20 – 25% तक हो सकता है। अतः किण्वन से अधिकतम 25% एल्कॉहल की मदिरा बनाना ही सम्भव है। मदिरा में इससे अधिक एल्कॉहल के लिये उसका आसवन करना पड़ता है।

आसवन या डिस्टिलेशन (distillation) प्रक्रिया में विभिन्न क्वथनांक वाले द्रवों के मिश्रण से उनको पहले वाष्पित करके और फिर द्रवित करके पृथक किया जाता है। किण्वन के पश्चात प्राप्त मदिरा में 10 से 15 प्रतिशत एल्कॉहल (एथाइल एल्कॉहल या एथेनॉल) (क्वथनांक 78.4 डिग्री सेन्टीग्रेड) और शेष जल (क्वथनांक 100 डिग्री सेन्टीग्रेड) होता है। गर्म करने पर एल्कॉहल पानी की अपेक्षा अधिक मात्रा में वाष्पित होता है। इस प्रकार आसवन के हर चरण में प्राप्त द्रव में एल्कॉहल की मात्रा पहले से 10 से 20 प्रतिशत तक अधिक रहती है। सामान्यतः कई बार आसवन करके मदिरा में एल्कॉहल की मात्रा को बढ़ाया जाता है। जितनी अधिक बार आसवन किया जाता है, मदिरा की गन्ध और स्वाद कम होते जाते हैं और एल्कॉहल की मात्रा बढ़ती जाती है। इसीलिये जहाँ व्हिस्की, ब्रांडी और डार्क रम का केवल दो बार आसवन करते हैं वहीं वोडका और लाइट रम को तीन से पाँच बार आसवित किया जाता है। सामान्य आसवन से एल्कॉहल की मात्रा 95% तक बढ़ायी जा सकती है। 95% एल्कॉहल को 190 प्रूफ ग्रेन स्पिरिट या न्यूट्रल ग्रेन स्पिरिट (neutral grain spirit) कहते हैं। 95.6% एल्कॉहल और 4.4% पानी मिलकर एज़ियोट्रॉप (एक ही ताप पर उबलने वाला मिश्रण) बनाते हैं जो 78.1 डिग्री सेन्टीग्रेड पर उबलता है अतः सामान्य आसवन से इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। 40-43% प्रतिशत एल्कॉहल की मदिरा बिना कुछ मिलाये पीने योग्य होती है परन्तु इससे अधिक एल्कॉहल वाली मदिरा पीने के योग्य नहीं होती यद्यपि उसे कॉकटेल में मिलाकर पिया जा सकता है। इसी कारण से अधिकतर आसवित मदिरायें 40-43% एल्कॉहल के साथ मिलती हैं।

इसके अलावा विभिन्न मदिराओं के उत्पादन में कुछ और भौतिक क्रियायें जैसे निस्पन्दन (filtration), परिपक्वन (aging) आदि प्रयोग की जाती हैं जिनका मुख्य उद्देश्य मदिरा के स्वाद में वृद्धि करना और उसकी दुर्गन्ध से मुक्ति पाना है। उदाहरण के लिये चारकोल (लकड़ी का कोयला) से छानकर मदिरा की गन्ध को एक हद तक कम किया जा सकता है।

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मदिरा – 101

अंग्रेजी में विभिन्न प्रकार की मदिराओं के अलग अलग नाम हैं जबकि हिन्दी में सामान्यतः सभी प्रकार की मदिराओं को मदिरा, शराब, सुरा, सोमरस, मद्य, दारू या चालू भाषा में ठर्रा और न जाने क्या क्या कहा जाता है। इन सभी का शाब्दिक अर्थ है एल्कोहल युक्त मादक पेय या अंग्रेजी में कहें तो एल्कोहलिक बेवेरेज (alcoholic beverages)। सभी प्रकार की मदिराओं को दो अवयवों में विभाजित कर सकते हैं एक एल्कोहल जिससे नशा होता है और दूसरा उसके अन्य तत्व जोकि उसकी स्वाद, सुगन्ध, रंग और पौष्टिकता के लिये जिम्मेदार होते हैं। सरलता के लिये हिन्दी में भी हम सभी प्रकार की मदिराओं के लिये प्रयुक्त अंग्रेजी शब्दों का ही प्रयोग करेंगे। इससे पहले कि हम आगे बढ़ें कुछ तकनीकी शब्दों को जान लें। सभी प्रकार की मदिरायें किण्वन या फ़र्मन्टेशन नाम की जैविक क्रिया से बनायी जाती हैं यही क्रिया सिरका और खमीर बनाने के लिये भी उत्तरदायी है। इस क्रिया से प्रयुक्त मूल पदार्थ में उपस्थित कार्बोहाइड्रेट, स्टार्च इत्यादि के क्षरण से एल्कोहल बनता है और कार्बन डाई ऑक्साइड गैस निकलती है। अधिकतर मदिराओं के उत्पादन में जो दूसरी जैव-रासायनिक क्रिया प्रयुक्त होती है उसे कहते हैं परिपक्वन या एजिंग। इस क्रिया में किण्वन के बाद प्राप्त मदिरा को किसी विशेष प्रकार के पात्र में एक नियत ताप पर कुछ समय (कभी कभी कई वर्षो तक) के लिये रखकर उसके स्वाद, सुगन्ध व पौष्टिकता में वृद्धि की जाती है। इसके अलावा किण्वन के पश्चात प्राप्त; मातृ-द्रव के शोधन के लिये आसवन या डिस्टिलेशन का प्रयोग करते हैं। तो आइये जानते हैं कि विश्व में कौन कौन सी प्रसिद्ध मदिरायें पायी जाती हैं उनका स्रोत और कुछ अन्य अनूठी बातें। सभी प्रकार की मदिराओं को मुख्यतः तीन भागों में बाँट सकते हैं बियर, वाइन और स्प्रिट। बियर और वाइन में अपेक्षाकृत कम एल्कोहल होता है, इनका आसवन नहीं किया जाता और ये बिना कुछ मिलाये पी जाती है जबकि स्प्रिट में अधिक एल्कोहल होने के कारण इसमें पानी, सोडा, फलों का रस या कोल्ड ड्रिंक मिला कर पीते हैं।

बियर (Beer): बियर मुख्यतः जौ, गेहूँ, मक्का इत्यादि अनाजों के अधूरे किण्वन और बहुत कम समय (1-2 सप्ताह) के परिपक्वन से बनायी जाती है। किण्वन और परिपक्वन के समय निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड की वजह से बियर एक प्राकृतिक रूप से कार्बोनेटेड पेय है। इसमें एल्कोहल प्रतिशत 3 से 30% तक हो सकता है। परन्तु सामान्यतया लाइट बियर में 4% और स्ट्रॉंग बियर में 8% एल्कोहल होता है। जर्मन बियर सबसे प्रसिद्ध हैं। भारत में किंगफ़िशर, हेवर्ड 5000, फ़ोस्टर, गोल्डन ईगल इत्यादि ब्रान्ड्स बाज़ार में उपलब्ध हैं। विभिन्न प्रदेशों मे कर भिन्नता के कारण 650 ml की बोतल का दाम 40 से 90 रुपये तक होता है। बियर के बारे और जानकारी एक अलग पोस्ट में।

वाइन (Wine): वाइन मुख्यतः फलों के रस (अधिकतर अंगूर) के पूरे किण्वन और परिपक्वन से बनाई जाती है। इसमें एल्कोहल का प्रतिशत 9 से 18% तक हो सकता है। फ्रांस एक प्रमुख वाइन उत्पादक देश है, इसके अलावा इटली, स्पेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया भी विश्व भर में अच्छी मात्रा में वाइन निर्यात करते हैं। वाइन का नामांकन उसे बनाने में प्रयुक्त अंगूर के प्रकार पर किया जाता है, जैसे मर्लो (Merlot), कैबर्ने सोवेनॉन (Cabernet Sauvignon), शार्डना (Chardonnay), पिनॉ नोआर (Pinot noir) इत्यादि। साधारण भाषा में वाइन के रंग के आधार पर इन्हें रेड वाइन और व्हाइट वाइन में बाँटा जाता है। बियर की ही भाँति वाइन का भी आसवन नहीं किया जाता है। वाइन एक महँगी मदिरा है, भारतीय वाइन की एक बोतल (750 ml) 300 रूपये से 1,000 रुपये तक होती है जबकि आयातित वाइन 600 रुपये से लेकर 5,000 रुपये या उससे भी महँगी हो सकती है। वाइन के बारे में और अधिक जानकारी आगे आने वाली पोस्ट में।

व्हिस्की (Whisky): व्हिस्की मुख्यतः जौ, गेहूँ, मक्का इत्यादि अनाजों के पूरे किण्वन, आसवन और परिपक्वन द्वारा बनाई जाती है। इसमें एल्कॉहल प्रतिशत 30 से 65% तक हो सकता है, परन्तु सामान्यतया यह 43% होता है। स्कॉटलैंड एक प्रमुख व्हिस्की उत्पादक देश है और वहाँ पर बनाई गयी व्हिस्की को स्कॉच (Scotch) कहते हैं, इसके अलावा आयरलैंड और अमेरिका भी व्हिस्की के प्रमुख उत्पादक हैं। जो व्हिस्की अंकुरित अनाज से बनाई जाती है उसे माल्ट व्हिस्की कहते हैं और यह अपेक्षाकृत अच्छी और महँगी होती है। बिना अंकुरण के अनाज से बनाई जाने वाली व्हिस्की को ग्रेन व्हिस्की कहते हैं। सामान्यतः कई व्हिस्की को मिलाकर मिश्रित या ब्लेंडेड व्हिस्की के रूप में बेचा जाता है। व्हिस्की की गुणवत्ता और दाम उसके परिपक्वन के समय और एकल या मिश्रित प्रकार पर निर्भर करते हैं। भारत में निर्मित ग्रेन व्हिस्की की एक बोतल (750 ml) का दाम 200 रुपये से 1000 रुपये तक होता है जबकि एक आयातित 21 वर्ष पुरानी स्कॉच का दाम 4,000 रुपये 10,000 रुपये या और अधिक हो सकता है। व्हिस्की के बारे में और अधिक जानकारी अगले पोस्ट में।

ब्रान्डी (Brandy): ब्रान्डी को वाइन के आसवन से बनाया जाता है। इसमें 36-60% तक एल्कॉहल होता है। इसका उत्पादन भी मुख्यतः यूरोपीय देशों मे ही होता है।

रम (Rum): रम गन्ने के रस या शीरे (molasses) के किण्वन और आसवन से बनायी जाती है। इसमें भी 40 से 70% तक एल्कॉहल होता है। प्रमुख उत्पादकों मे कैरेबियन और दक्षिण अमेरिकी देश आते हैं।

वोडका (Vodka): वोडका को आलू से निकाली गयी स्टार्च के किण्वन और आसवन से बनाते हैं। इसमें 40-60% तक एल्कॉहल होता है। इसके प्रमुख उत्पादक देश रूस, रोमानिया, पोलैंड और अन्य पूर्वी यूरोपीय देश हैं।

इसके अतिरिक्त जिन (Gin), ताड़ी (Toddy) जोकि नारियल और ताड़ के पेड़ से निकाली जाती है, फ़ेनी (Fenny) जोकि मुख्यतः गोवा में काजू से बनाई जाती है, टक़ीला (Tequila) जोकि मैक्सिको में अगेव नामक पौधे से बनाई जाती है, साके (Sake) जोकि जापान में चावल से बनाई जाती है इत्यादि अन्य प्रमुख मदिरायें है जो कि विश्व के विभिन्न भागों में प्रचलित हैं।

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