History of Beer

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कुछ प्रसिद्घ एल

एल ऊपरी किण्वन करने वाले यीस्ट (top fermenting yeast) से बनाई जाती है तथा इसका किण्वन सामान्य से अधिक ताप (15-23 oC) किया जाता है। अधिक ताप पर एल बियर यीस्ट प्रचुर मात्रा में ईस्टर (esters) बनाता है जिसकी वजह से बियर में सेब, नाशपाती, अनन्नास, केला, सूखी घास, बेर और आलूबुखारे इत्यादि से मिलती जुलती सुगन्ध और स्वाद आते हैं। इस पोस्ट में कुछ प्रचलित एल बियर के बारे में जानते हैं।

पेल एल (Pale Ale): यह हल्के रंग के अनाज से बनाई गयी एल है जिसका रंग 8 से 14 oSRM के बीच होता है। यद्यपि आजकल मिलने वाली कई बियर इससे हल्के रंग की होती है, परन्तु इसका नामकरण समकालीन ब्रिटिश पोर्टर और अन्य गहरे रंग की बियर की तुलना में किया गया था। इंगलैण्ड की बिटर (Bitter), स्कॉटलैंड की हैवी (Heavy) और इंडिया पेल एल (India Pale Ale/IPA), अमेरिका की अमेरिकन पेल एल (American Pale Ale) और जर्मनी की आल्ट्बीयर (Altbier या Alt) कुछ प्रमुख पेल एल हैं।

इनमें से इंडिया पेल एल (India Pale Ale/IPA) 17 वीं सदी में भारत में तैनात ब्रिटिश सैनिकों के लिये बनायी गयी बियर थी जिसमें साधारण से अधिक मात्रा में हॉप्स का प्रयोग किया जाता था ताकि लम्बी समुद्री यात्रा के बाद भी बियर खराब न हो। उस समय यह बियर केवल भारत को निर्यात के लिये ही बनाई जाती थी। परन्तु धीरे धीरे ब्रिटिश सैनिकों को इस बियर का स्वाद अच्छा लगने लगा और वापस लौटकर भी उन्होंने इसकी मांग की और आज भी यह बियर इंडिया पेल एल (India Pale Ale) या आई पी ए (IPA) के नाम से मिलती है। ये बियर सामान्य से अधिक कड़वी होती है और इसका IBU 40 से अधिक होता है।

पोर्टर (Porter): यह गहरे रंग के अनाज से बनी एल बियर है जिसका नाम 18वीं सदी में लंदन के स्ट्रीट और रिवर पोर्टर (सामान वाहक) के नाम पर पड़ा। अधिक एल्कॉहल वाली पोर्टर को स्ट्राँग पोर्टर, डबल पोर्टर या स्टाउट पोर्टर कहा जाता था जो कि आगे चलकर सिर्फ़ स्टाउट (Stout) कहा जाने लगा। आयरलैंड की गिनेस (Guinness) एक एक्सट्रा स्टाउट बियर है। इसका रंग 17 से 40 oSRM के बीच और IBU 18 से 50 तक होता है। इन बियर में अधिक मात्रा में माल्ट के प्रयोग से ये सामान्य से भारी होती हैं (विशिष्ट घनत्व 1.066 – 1.095)।

बार्ली वाइन (Barley wine): इनमें एल्कॉहल प्रतिशत 9 -12 तक (वाइन के बराबर) होता है अतः इसे बार्ली वाइन बोला जाता है परन्तु फलों के बजाय अनाज (जौ) से बनाई जाने के कारण यह एक बियर ही है। इसका रंग 12 से 24 oSRM के बीच और IBU 50 से 100 तक होता है। ये बियर 1.090 – 1.120 विशिष्ट घनत्व तक के मातृद्रव से बनायी जाती हैं जो कि सामान्य से काफी अधिक है।

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बियर के प्रकार

बियर के प्रकार या सही मायने में इसे शैली कहें तो मुख्यतः दो भागों में बाँट सकते हैं। एल (Ale) और लागर (Lager)। जैसा कि मैनें बियर पर अपनी पहली पोस्ट में भी लिखा था कि एल ऊपरी किण्वन करने वाले यीस्ट (top fermenting yeast) से बनाई जाती है जबकि लागर नीचले किण्वन करने वाले यीस्ट (Bottom fermenting yeast) से बनाई जाती है। बड़ी मात्रा में औद्योगिक स्तर पर बनाई जा सकने के कारण लागर बीयर सस्ती और अधिक प्रचलित होती है। इसके विपरीत एल बियर साधारणतः छोटे स्तर पर बनाई जाती है और अपेक्षाकृत महंगी होती है। यह वर्गीकरण तो हुआ बियर बनाने वाले यीस्ट के आधार पर। इन दोनों ही प्रकार की बियर में बनाने की विधि, रंग, स्वाद, अवयव, इतिहास और मूल स्थान के कारण और कई विविधतायें पायी जाती हैं। इस पोस्ट में हम बियर की इन्ही विविधताओं के बारे में जानते हैं।

कुछ प्रमुख एल हैं – ब्राउन एल (Brown Ale), पेल एल (Pale Ale), पोर्टर (Porter), स्टाउट (Stout), बार्ली वाइन (Barley Wine), बेल्जियन ट्रिपल (Belgian Trippel), बेल्जियन डबल (Belgian Dubbel) और व्हीट बियर (Wheat beer)।

प्रमुख लागर हैं – अमेरिकन स्टाइल लागर (American-style lager), बॉक (Bock), डंकल (Dunkel), हेलेस (Helles), ऑक्टोबरफ़ेस्टबीयर (Oktoberfestbier), पिल्ज़नर (Pilsner), श्वार्ज़बीयर (Schwarzbier) और वियना लागर (Vienna lager)।

इसके अलावा बेल्जियन लैम्बिक (Belgian Lambic), स्टीम बियर (Steam Beer), फ्रूट और वेजिटेबल बियर, हर्ब्स और स्पाइस्ड बियर इत्यादि कुछ अन्य प्रकार की बियर हैं।

इसके अलावा बियर शब्दावली में दो और नाम प्रसिद्ध हैं ड्रैफ़्ट बियर (Draught Beer) और क्राफ़्ट बियर (Craft Beer)। ड्रैफ़्ट बियर बड़े बंद बर्तन, जिसे केग (Keg) कहते हैं, में लगे नल (tap) से निकाल कर पी जाती है। अत: सामान्यतः बार या पार्टी में देखी जाती है। छोटी ब्र्यूवरी में सीमित मात्रा में बनी बियर को क्राफ़्ट बियर कहते हैं।

आने वाली पोस्टों में इस पोस्ट में बताई गयी कुछ बियर के बारे में और जानकारी लेंगे।

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बियर की गुणवत्ता के मात्रक

वाइन और आसवित मदिरा (या लिकर) के स्वाद और सुगंध के आंकलन की जटिल विधि के विपरीत बियर गुणवत्ता मुख्यतः उसके रंग और स्वाद में कड़वेपन को नापकर निर्धारित की जाती है। बियर के रंग का आंकलन एक प्रकार के स्पेक्ट्रोमीटर से किया जाता है और इसे स्टैंडर्ड रेफरेन्स मेथड (Standard Reference Method/ SRM), यूरोपियन ब्र्यूवरी कन्वेन्शन (European Brewery Convention/ EBC) या डिग्री लॉविबॉन्ड (Degrees Lovibond/ o L) में नापते हैं। जबकि स्वाद का आंकलन बियर के कड़वेपन के निर्धारण से होता है, जिसे इंटरनेशनल बिटरनेस यूनिट (International Bitterness Unit/ IBU) में नापते हैं।

स्टैंडर्ड रेफरेन्स मेथड (Standard Reference Method/ SRM):
यह स्पेक्ट्रोफोटोमीटर के प्रयोग से बियर के रंग के वस्तुनिष्ठ निर्धारण की विधि है। इसमें बियर को एक आधा इंच के पारदर्शी कप में रख कर उससे 430 नैनोमीटर तरंग दैर्ध्य का गहरा नीला प्रकाश उस पर डालते हैं और प्रकाश के अवशोषण को नापते हैं। 430 नैनोमीटर का प्रकाश बियर के रंगों में भिन्नता दर्शाने के लिये सबसे उपयुक्त होता है। बियर का रंग डिग्री एस आर एम ( o SRM) में नापने के लिये निम्नलिखित फार्मूला प्रयोग करते हैं –

o SRM = – 10. log10(I/Io)

जहाँ Io आपतित प्रकाश की तीव्रता तथा I संचरित प्रकाश की तीव्रता है। अर्थात किसी रंगहीन द्रव जिससे पूरा प्रकाश संचरित हो जाता है, के लिये I = Io, अतः o SRM = 0 (क्योंकि log10 1 = 0)। इसी प्रकार पूर्णतया अपारदर्शी द्रव के लिये I = 0 अतः o SRM = अनन्त (क्योंकि log10 0 = – अनन्त)। यदि 20% प्रकाश संचरित होता है तो I/Io= 0.2 और o SRM = 7। o SRM को निकटतम पूर्णांक में ही प्रदर्शित करते हैं। सामान्यतः बियर का o SRM 2 से 70 तक होता है।

इंटरनेशनल बिटरनेस यूनिट (International Bitterness Unit/ IBU):
IBU पैमाने का प्रयोग बियर के कड़वेपन के आंकलन में किया जाता है जिसे स्पेक्ट्रोफोटोमीटर और सॉल्वेंट एक्सट्रैक्शन विधि से नापते हैं। बियर में कड़वापन उसमे उपस्थित हॉप्स (Hops) के कारण होता है जिसे बियर में उपस्थित माल्ट के स्वाद को सन्तुलित करने के लिये मिलाया जाता है। हॉप्स में एल्फ़ा एसिड (Alpha acids) की मात्रा यह निर्धारित करती है कि वास्तव में हॉप्स का कितना स्वाद (कड़वापन) बियर में स्थानान्तरित होता है। अतः बियर का IBU निर्धारित करने के लिये बियर उत्पादक निम्नलिखित फार्मूला प्रयोग करते हैं –

IBU = Wh × AA% × Uaa ⁄ ( Vw × 1.34 )

जहाँ Wh हॉप्स की मात्रा (आउन्स में), AA% हॉप्स में उपस्थित एल्फ़ा एसिड का प्रतिशत, Uaa प्रयुक्त एल्फ़ा एसिड का प्रतिशत और Vw बियर के मातृ द्रव का कुल आयतन (गैलन में) है। सामान्यतः बियर का IBU 5 से 100 तक होता है।

अधिकतर बियर उत्पादक इस सूचना को अपने तक ही सीमित रखते है और अपने ब्राँड में नियमितता लाने हेतु प्रयोग करते हैं।

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मद्यरोधी मानसिकता कितनी कारगर?

भारतीय संस्कृति मद्यपान को प्रोत्साहित नहीं करती है जोकि एक हद तक उचित और तर्कसंगत भी है। परन्तु वर्तमान परिपेक्ष में हम ये सोचें कि आखिर इस मद्यरोधी मानसिकता का वास्तव में कोई लाभ है तो कई तथ्य सामने आते हैं। मद्यपान के स्वास्थ्य पर बहुत से नकारात्मक प्रभाव होते हैं जैसे कि अधिक मात्रा में शर्करा या वसा युक्त भोजन के होते हैं। अतः मद्यपान में भी अन्य चीजों की भाँति ही नियंत्रण की आवश्यकता होती है।

पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार से हमने अपना आर्थिक विकास किया है और पाश्चात्य संस्कृति को अपनाया है उसी प्रकार से मद्यपान को भी धीरे-धीरे सामाजिक स्वीकृति मिलने लगी है। आज पार्टियों में वाइन, बियर आदि पीना आपके सामाजिक होने का प्रतिरूप बनता जा रहा है। अभी क्योंकि हम एक संक्रमण के दौर से गुज़र रहे हैं अतः बहुत से लोगों को इस संस्कृति को अपनाने में अभी कठिनाई हो परन्तु हमारे पास शायद अब कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है।

ऐसा नहीं है कि भारतीय इतिहास में मदिरा का उल्लेख नहीं है। जब देवता इसे पीते थे तो सुरा कहते थे और जब दानव तो मदिरा। इसे एक प्रकार से अपनी सुविधा कह लीजिये या फिर भ्रम। हमारा इतिहास मदिरापान को स्वीकृति देने को लेकर एकमत नहीं है।

जहाँ तक मदिरा पान और उससे जुड़ी बुराइयों की बात है तो भी जितनी दुनिया मैने देखी है उसमें मदिरा पान और व्यक्तिगत चरित्र के बीच कोई सम्बन्ध स्थापित करना लगभग उतना ही आधारविहीन है जितना कि जाति या धर्म से व्यक्ति के चरित्र का निर्धारण। अर्थात प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदिरा पान आपके चरित्र को प्रभावित नहीं करता। मदिरा पान के कारण स्नायु तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव से कई बार व्यक्ति अन्तर्निहित भावनाओं को प्रकट कर देता है। परन्तु इसे मदिरा पान के दुष्प्रभाव के रूप में देखना गलत है।

भारत में आज यदि देखें तो सम्भवतः पंजाब और केरल में सबसे अधिक मदिरा पी जाती है परन्तु साक्षरता, समृद्धि और सामाजिक स्तर की दृष्टि से ये दोनों ही प्रदेश अन्य प्रदेशों की तुलना में आगे हैं। भारत में अन्य देशों की तुलना में मदिरा पर काफ़ी अधिक कर लगाया जाता है और कई प्रदेशों में नशाबन्दी भी है। परन्तु यह मेरे विचार से यह किसी भी मदिरा पीने वाले को रोकने में अक्षम है, हाँ शायद आर्थिक तंगी की वजह से लोग सस्ती मदिराओं का पान करने लगें।

अन्त में मैं यही कहूँगा कि मदिरा पीना या न पीना एक व्यक्तिगत निर्णय है जो कि समझबूझ कर लेना चाहिये। नियम कानून बनाकर केवल तस्करी, कालाबाजारी और दूषित मदिरा उत्पादन को ही बढ़ावा मिलता है। पिछले 15 वर्षों में हमने खुले बाज़ार से अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत किया है तो मदिरा बाज़ार को भी मुक्त करके देखना चाहिये। मेरा विश्वास है कि इसके सकारात्मक परिणाम ही सामने आ सकते हैं।

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मदिरा उत्पादन: एक जैव रासायनिक दृष्टिकोण

मदिरा उत्पादन की सबसे महत्त्वपूर्ण और अभिन्न प्रक्रिया है किण्वन या फर्मन्टेशन (fermentation)। इस प्रक्रिया में कुछ कवक, जिन्हें यीस्ट (खमीर) कहते हैं, शर्करा, ग्लूकोज़, फ्रक्टोज़, स्टार्च आदि बड़े अणुओं को वायु की अनुपस्थिति में अपघटित करके एल्कॉहल बनाते हैं। इस प्रक्रिया में कार्बन डाई ऑक्साइड गैस निकलती है जिसे या तो मदिरा से निकल जाने देते हैं या फिर यदि मदिरा को कार्बोनेटेड (सोडे या कोल्ड-ड्रिंक की भाँति) रखना है तो किण्वन पात्र को बन्द करके रखते हैं उदाहरणार्थ बियर और स्पार्कलिंग वाइन में कार्बन डाई ऑक्साइड मिली रहती है। अंगूर की खाल में प्राकृतिक रूप से यीस्ट पाया जाता है जिसे जंगली यीस्ट (wild yeast) कहते हैं। किण्वन से बना एल्कॉहल यीस्ट की सेहत के लिये अच्छा नहीं होता और द्रव में एल्कॉहल के एक नियत प्रतिशत से अधिक हो जाने पर यीस्ट जीवित नहीं रह सकता। यह नियत प्रतिशत बेकिंग यीस्ट के लिये 4 – 6%, अंगूर की खाल में पाये जाने वाले जंगली यीस्ट के लिये 12 – 16% और कुछ विशिष्ट यीस्ट के लिये 20 – 25% तक हो सकता है। अतः किण्वन से अधिकतम 25% एल्कॉहल की मदिरा बनाना ही सम्भव है। मदिरा में इससे अधिक एल्कॉहल के लिये उसका आसवन करना पड़ता है।

आसवन या डिस्टिलेशन (distillation) प्रक्रिया में विभिन्न क्वथनांक वाले द्रवों के मिश्रण से उनको पहले वाष्पित करके और फिर द्रवित करके पृथक किया जाता है। किण्वन के पश्चात प्राप्त मदिरा में 10 से 15 प्रतिशत एल्कॉहल (एथाइल एल्कॉहल या एथेनॉल) (क्वथनांक 78.4 डिग्री सेन्टीग्रेड) और शेष जल (क्वथनांक 100 डिग्री सेन्टीग्रेड) होता है। गर्म करने पर एल्कॉहल पानी की अपेक्षा अधिक मात्रा में वाष्पित होता है। इस प्रकार आसवन के हर चरण में प्राप्त द्रव में एल्कॉहल की मात्रा पहले से 10 से 20 प्रतिशत तक अधिक रहती है। सामान्यतः कई बार आसवन करके मदिरा में एल्कॉहल की मात्रा को बढ़ाया जाता है। जितनी अधिक बार आसवन किया जाता है, मदिरा की गन्ध और स्वाद कम होते जाते हैं और एल्कॉहल की मात्रा बढ़ती जाती है। इसीलिये जहाँ व्हिस्की, ब्रांडी और डार्क रम का केवल दो बार आसवन करते हैं वहीं वोडका और लाइट रम को तीन से पाँच बार आसवित किया जाता है। सामान्य आसवन से एल्कॉहल की मात्रा 95% तक बढ़ायी जा सकती है। 95% एल्कॉहल को 190 प्रूफ ग्रेन स्पिरिट या न्यूट्रल ग्रेन स्पिरिट (neutral grain spirit) कहते हैं। 95.6% एल्कॉहल और 4.4% पानी मिलकर एज़ियोट्रॉप (एक ही ताप पर उबलने वाला मिश्रण) बनाते हैं जो 78.1 डिग्री सेन्टीग्रेड पर उबलता है अतः सामान्य आसवन से इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। 40-43% प्रतिशत एल्कॉहल की मदिरा बिना कुछ मिलाये पीने योग्य होती है परन्तु इससे अधिक एल्कॉहल वाली मदिरा पीने के योग्य नहीं होती यद्यपि उसे कॉकटेल में मिलाकर पिया जा सकता है। इसी कारण से अधिकतर आसवित मदिरायें 40-43% एल्कॉहल के साथ मिलती हैं।

इसके अलावा विभिन्न मदिराओं के उत्पादन में कुछ और भौतिक क्रियायें जैसे निस्पन्दन (filtration), परिपक्वन (aging) आदि प्रयोग की जाती हैं जिनका मुख्य उद्देश्य मदिरा के स्वाद में वृद्धि करना और उसकी दुर्गन्ध से मुक्ति पाना है। उदाहरण के लिये चारकोल (लकड़ी का कोयला) से छानकर मदिरा की गन्ध को एक हद तक कम किया जा सकता है।

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मदिरा की उचित मात्रा

एक बार में परोसी जाने वाली मदिरा की मात्रा कई बातों पर निर्भर करती है जैसे मदिरा का प्रकार, प्रयोजन, भौगोलिक वातावरण, सरकारी विनियम और स्वास्थ्य। साधारण तौर पर एक बार में दी जाने वाली मदिरा, जिसे एक यूनिट या एक सर्विंग कहते हैं, में 25 मिली लीटर से अधिक शुद्ध एल्कॉहल नहीं होना चाहिये। इस हिसाब से एक यूनिट में लगभग 500 मिली लीटर बियर (5% ABV1), 200 मिली लीटर वाइन (12.5% ABV) और 60 मिली लीटर आसवित मदिरा जैसे व्हिस्की, वोडका, ब्रांडी आदि (43% ABV) आती है। अमेरिका में एक यूनिट मदिरा में 0.6 आउन्स (17.75 मिली लीटर) एल्कॉहल होना चाहिये जबकि इंगलैंड में यह सीमा 10 मिली लीटर है। भारत में एक यूनिट, जिसे पेग (peg) भी कहा जाता है, में 20 मिली लीटर एल्कॉहल होता है अर्थात 350 मिली लीटर बीयर (8% ABV), 160 मिली लीटर वाइन और 45 मिली लीटर आसवित मदिरा। सामान्यतः शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ्य व्यक्ति दिन में 1 से 2 यूनिट मदिरा बिना किसी खास दुष्प्रभाव के पी सकता है।

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1ABV == Alcohol by Volume, एल्कॉहल का आयतन प्रतिशत

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