Category Archives: गैर वर्गीकृत

स्वनिर्मित साइडर

साइडर सेब के रस से निर्मित एक एल्कॉहलीय पेय है। भारत में आजकल हिमाचल प्रदेश में इसका काफी मात्रा में उत्पादन होने लगा है और यह बियर का अच्छा विकल्प है। मेरी पिछली पोस्ट में बतायी गयी घर पर रेड वाइन बनाने की विधि में ही सेब के रस का प्रयोग करके साइडर भी बनाया जा सकता है। नीचे कुछ चित्र, मेरे द्वारा बनाये गए साइडर के हैं जो मैंने जनवरी में बनाया था और लगभग ५ माह के परिपक्वन के बाद पिछले सप्ताह इसका उपभोग किया।

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दिल्ली में विदेशी मदिरा के दाम की सूची

दिल्ली प्रदेश औद्योगिक एवं अवसंरचना विकास प्राधिकरण (Delhi State Industrial & Infrastructure Development Corporation Ltd / DSIIDC) की वेबसाइट पर उपलब्ध सूचना के अनुसार दिल्ली प्रदेश में विदेशी आयातित मदिरा (Imported Liquor) और भारत में बनी विदेशी मदिरा (IMFL) के दाम नीचे दिये गये लिंक पर देखे जा सकते हैं।

आयातित मदिरा :
http://www.dsiidc.org/dsidc/upload/ratefl.txt

आई एम एफ़ एल :
http://www.dsiidc.org/dsidc/upload/rate.txt

साथ ही इस वेबसाइट पर दिल्ली सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त दुकानों की सूची भी उपलब्ध है।
http://www.dsiidc.org/dsidc/liquorshop.html

किसी भी प्रकार की अनियमितता के लिये इस साइट के माध्यम से शिकायत भी दर्ज की जा सकती है।

उत्तर प्रदेश आबकारी विभाग द्वारा निर्धारित अधिकतम मदिरा मूल्य सूची यहाँ से डाउनलोड की जा सकती है।

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मद्यरोधी मानसिकता कितनी कारगर?

भारतीय संस्कृति मद्यपान को प्रोत्साहित नहीं करती है जोकि एक हद तक उचित और तर्कसंगत भी है। परन्तु वर्तमान परिपेक्ष में हम ये सोचें कि आखिर इस मद्यरोधी मानसिकता का वास्तव में कोई लाभ है तो कई तथ्य सामने आते हैं। मद्यपान के स्वास्थ्य पर बहुत से नकारात्मक प्रभाव होते हैं जैसे कि अधिक मात्रा में शर्करा या वसा युक्त भोजन के होते हैं। अतः मद्यपान में भी अन्य चीजों की भाँति ही नियंत्रण की आवश्यकता होती है।

पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार से हमने अपना आर्थिक विकास किया है और पाश्चात्य संस्कृति को अपनाया है उसी प्रकार से मद्यपान को भी धीरे-धीरे सामाजिक स्वीकृति मिलने लगी है। आज पार्टियों में वाइन, बियर आदि पीना आपके सामाजिक होने का प्रतिरूप बनता जा रहा है। अभी क्योंकि हम एक संक्रमण के दौर से गुज़र रहे हैं अतः बहुत से लोगों को इस संस्कृति को अपनाने में अभी कठिनाई हो परन्तु हमारे पास शायद अब कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है।

ऐसा नहीं है कि भारतीय इतिहास में मदिरा का उल्लेख नहीं है। जब देवता इसे पीते थे तो सुरा कहते थे और जब दानव तो मदिरा। इसे एक प्रकार से अपनी सुविधा कह लीजिये या फिर भ्रम। हमारा इतिहास मदिरापान को स्वीकृति देने को लेकर एकमत नहीं है।

जहाँ तक मदिरा पान और उससे जुड़ी बुराइयों की बात है तो भी जितनी दुनिया मैने देखी है उसमें मदिरा पान और व्यक्तिगत चरित्र के बीच कोई सम्बन्ध स्थापित करना लगभग उतना ही आधारविहीन है जितना कि जाति या धर्म से व्यक्ति के चरित्र का निर्धारण। अर्थात प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदिरा पान आपके चरित्र को प्रभावित नहीं करता। मदिरा पान के कारण स्नायु तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव से कई बार व्यक्ति अन्तर्निहित भावनाओं को प्रकट कर देता है। परन्तु इसे मदिरा पान के दुष्प्रभाव के रूप में देखना गलत है।

भारत में आज यदि देखें तो सम्भवतः पंजाब और केरल में सबसे अधिक मदिरा पी जाती है परन्तु साक्षरता, समृद्धि और सामाजिक स्तर की दृष्टि से ये दोनों ही प्रदेश अन्य प्रदेशों की तुलना में आगे हैं। भारत में अन्य देशों की तुलना में मदिरा पर काफ़ी अधिक कर लगाया जाता है और कई प्रदेशों में नशाबन्दी भी है। परन्तु यह मेरे विचार से यह किसी भी मदिरा पीने वाले को रोकने में अक्षम है, हाँ शायद आर्थिक तंगी की वजह से लोग सस्ती मदिराओं का पान करने लगें।

अन्त में मैं यही कहूँगा कि मदिरा पीना या न पीना एक व्यक्तिगत निर्णय है जो कि समझबूझ कर लेना चाहिये। नियम कानून बनाकर केवल तस्करी, कालाबाजारी और दूषित मदिरा उत्पादन को ही बढ़ावा मिलता है। पिछले 15 वर्षों में हमने खुले बाज़ार से अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत किया है तो मदिरा बाज़ार को भी मुक्त करके देखना चाहिये। मेरा विश्वास है कि इसके सकारात्मक परिणाम ही सामने आ सकते हैं।

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मदिरा उत्पादन: एक जैव रासायनिक दृष्टिकोण

मदिरा उत्पादन की सबसे महत्त्वपूर्ण और अभिन्न प्रक्रिया है किण्वन या फर्मन्टेशन (fermentation)। इस प्रक्रिया में कुछ कवक, जिन्हें यीस्ट (खमीर) कहते हैं, शर्करा, ग्लूकोज़, फ्रक्टोज़, स्टार्च आदि बड़े अणुओं को वायु की अनुपस्थिति में अपघटित करके एल्कॉहल बनाते हैं। इस प्रक्रिया में कार्बन डाई ऑक्साइड गैस निकलती है जिसे या तो मदिरा से निकल जाने देते हैं या फिर यदि मदिरा को कार्बोनेटेड (सोडे या कोल्ड-ड्रिंक की भाँति) रखना है तो किण्वन पात्र को बन्द करके रखते हैं उदाहरणार्थ बियर और स्पार्कलिंग वाइन में कार्बन डाई ऑक्साइड मिली रहती है। अंगूर की खाल में प्राकृतिक रूप से यीस्ट पाया जाता है जिसे जंगली यीस्ट (wild yeast) कहते हैं। किण्वन से बना एल्कॉहल यीस्ट की सेहत के लिये अच्छा नहीं होता और द्रव में एल्कॉहल के एक नियत प्रतिशत से अधिक हो जाने पर यीस्ट जीवित नहीं रह सकता। यह नियत प्रतिशत बेकिंग यीस्ट के लिये 4 – 6%, अंगूर की खाल में पाये जाने वाले जंगली यीस्ट के लिये 12 – 16% और कुछ विशिष्ट यीस्ट के लिये 20 – 25% तक हो सकता है। अतः किण्वन से अधिकतम 25% एल्कॉहल की मदिरा बनाना ही सम्भव है। मदिरा में इससे अधिक एल्कॉहल के लिये उसका आसवन करना पड़ता है।

आसवन या डिस्टिलेशन (distillation) प्रक्रिया में विभिन्न क्वथनांक वाले द्रवों के मिश्रण से उनको पहले वाष्पित करके और फिर द्रवित करके पृथक किया जाता है। किण्वन के पश्चात प्राप्त मदिरा में 10 से 15 प्रतिशत एल्कॉहल (एथाइल एल्कॉहल या एथेनॉल) (क्वथनांक 78.4 डिग्री सेन्टीग्रेड) और शेष जल (क्वथनांक 100 डिग्री सेन्टीग्रेड) होता है। गर्म करने पर एल्कॉहल पानी की अपेक्षा अधिक मात्रा में वाष्पित होता है। इस प्रकार आसवन के हर चरण में प्राप्त द्रव में एल्कॉहल की मात्रा पहले से 10 से 20 प्रतिशत तक अधिक रहती है। सामान्यतः कई बार आसवन करके मदिरा में एल्कॉहल की मात्रा को बढ़ाया जाता है। जितनी अधिक बार आसवन किया जाता है, मदिरा की गन्ध और स्वाद कम होते जाते हैं और एल्कॉहल की मात्रा बढ़ती जाती है। इसीलिये जहाँ व्हिस्की, ब्रांडी और डार्क रम का केवल दो बार आसवन करते हैं वहीं वोडका और लाइट रम को तीन से पाँच बार आसवित किया जाता है। सामान्य आसवन से एल्कॉहल की मात्रा 95% तक बढ़ायी जा सकती है। 95% एल्कॉहल को 190 प्रूफ ग्रेन स्पिरिट या न्यूट्रल ग्रेन स्पिरिट (neutral grain spirit) कहते हैं। 95.6% एल्कॉहल और 4.4% पानी मिलकर एज़ियोट्रॉप (एक ही ताप पर उबलने वाला मिश्रण) बनाते हैं जो 78.1 डिग्री सेन्टीग्रेड पर उबलता है अतः सामान्य आसवन से इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। 40-43% प्रतिशत एल्कॉहल की मदिरा बिना कुछ मिलाये पीने योग्य होती है परन्तु इससे अधिक एल्कॉहल वाली मदिरा पीने के योग्य नहीं होती यद्यपि उसे कॉकटेल में मिलाकर पिया जा सकता है। इसी कारण से अधिकतर आसवित मदिरायें 40-43% एल्कॉहल के साथ मिलती हैं।

इसके अलावा विभिन्न मदिराओं के उत्पादन में कुछ और भौतिक क्रियायें जैसे निस्पन्दन (filtration), परिपक्वन (aging) आदि प्रयोग की जाती हैं जिनका मुख्य उद्देश्य मदिरा के स्वाद में वृद्धि करना और उसकी दुर्गन्ध से मुक्ति पाना है। उदाहरण के लिये चारकोल (लकड़ी का कोयला) से छानकर मदिरा की गन्ध को एक हद तक कम किया जा सकता है।

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मदिरा की उचित मात्रा

एक बार में परोसी जाने वाली मदिरा की मात्रा कई बातों पर निर्भर करती है जैसे मदिरा का प्रकार, प्रयोजन, भौगोलिक वातावरण, सरकारी विनियम और स्वास्थ्य। साधारण तौर पर एक बार में दी जाने वाली मदिरा, जिसे एक यूनिट या एक सर्विंग कहते हैं, में 25 मिली लीटर से अधिक शुद्ध एल्कॉहल नहीं होना चाहिये। इस हिसाब से एक यूनिट में लगभग 500 मिली लीटर बियर (5% ABV1), 200 मिली लीटर वाइन (12.5% ABV) और 60 मिली लीटर आसवित मदिरा जैसे व्हिस्की, वोडका, ब्रांडी आदि (43% ABV) आती है। अमेरिका में एक यूनिट मदिरा में 0.6 आउन्स (17.75 मिली लीटर) एल्कॉहल होना चाहिये जबकि इंगलैंड में यह सीमा 10 मिली लीटर है। भारत में एक यूनिट, जिसे पेग (peg) भी कहा जाता है, में 20 मिली लीटर एल्कॉहल होता है अर्थात 350 मिली लीटर बीयर (8% ABV), 160 मिली लीटर वाइन और 45 मिली लीटर आसवित मदिरा। सामान्यतः शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ्य व्यक्ति दिन में 1 से 2 यूनिट मदिरा बिना किसी खास दुष्प्रभाव के पी सकता है।

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1ABV == Alcohol by Volume, एल्कॉहल का आयतन प्रतिशत

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एल्कॉहलीय प्रूफ (Alcoholic proof)

एल्कॉहलिक प्रूफ किसी एल्कॉहलिक पेय में एल्कॉहल की मात्रा निर्धारित करने का एक पैमाना है। 18वीं सदी से 1 जनवरी 1980 तक यही पैमाना मुख्यतः प्रचलन में था। यद्यपि आजकल लगभग सभी देशों में मदिरा में एल्कॉहल को आयतन प्रतिशत (Alcohol By Volume / ABV) में मापा जाता है तथापि बहुत से मदिरा उत्पादक इस पैमाने को भी साथ में प्रयोग करते हैं।

18वीं सदी के यूरोपीय मदिरा व्यापारी रम में एल्कॉहल की मात्रा जाँचने के लिये एक परीक्षण करते थे। वे थोड़े से बारूद (gunpowder) को रम से गीला करके उसे जलाकर देखते थे, यदि बारूद जल जाता था तो उस मदिरा को सत्यापित मदिरा या प्रूव्ड स्पिरिट (proved spirit) कहते थे। न्यूनतम मात्रा में एल्कॉहल वाली मदिरा जो बारूद को जलने देती है उसे 100 डिग्री प्रूफ (100 o proof) स्पिरिट कहते हैं। बाद में ये पाया गया कि इस मदिरा में एल्कॉहल का आयतन प्रतिशत 57.15% होता है जो कि लगभग 7 भाग मदिरा में 4 भाग एल्कॉहल के बराबर है। अत: 100% शुद्ध एल्कॉहल 175 डिग्री प्रूफ स्पिरिट हुआ। अर्थात किसी भी मदिरा का डिग्री प्रूफ उसमें एल्कॉहल के आयतन प्रतिशत को 1.75 से गुणा करके निकाला जा सकता है। उदाहरण के लिये 42.8% एल्कॉहल वाली मदिरा 75 डिग्री प्रूफ स्पिरिट होगी।

अमेरिका में प्रयोग होने वाले एल्कॉहलिक प्रूफ पैमाने में मदिरा के आयतन एल्कॉहल प्रतिशत को 2 से गुणा किया जाता है और इसे केवल प्रूफ स्पिरिट कहा जाता है (डिग्री का प्रयोग नहीं करते)। उदाहरण के लिये 80 प्रूफ स्पिरिट में 40% एल्कॉहल होगा।

इसके अतिरिक्त कई बार एल्कॉहल के आयतन प्रतिशत को डिग्री गेलुसाक (oGL) भी कहा जाता है। उदाहरण के लिये शिवाज़ रीगल की बोतल पर लिखे 40oGL का अर्थ है कि उसमें 40% एल्कॉहल है।

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वाइन टेस्टिंग (Wine Tasting)

भोजन का मुख्य उद्देश्य यद्यपि क्षुधा निवारण ही होता है फिर भी स्वादिष्ट भोजन का अनुभव और उसे ग्रहण करने का एक तरीका होता है। यह बात वैज्ञानिक रूप से सत्यापित है कि यदि भोजन की सुगन्ध और स्वाद लेते हुये उसका भोग किया जाय तो सुपाच्य होता है। इसी प्रकार वाइन का रसास्वादन या वाइन टेस्टिंग भी वर्षों में विकसित एक तरीका है जिससे किसी भी वाइन या अन्य मदिरा का पूर्ण आनन्द उठाया जा सकता है। इस बात का कोई नियम नहीं है कि कौन सा स्वाद अच्छा या बुरा है क्योंकि स्वाद एक व्यक्तिगत आंकलन और निर्णय होता है। परन्तु स्वाद का पूर्ण अनुभव लेने के लिये एक मानक विधि होती है जिसमें वाइन के रसास्वादन के समय ध्यान देने योग्य चीजों और कुछ सूचक स्वादों के बारे में बताया जाता है। प्रस्तुत है इस विधि के बारे में एक संक्षिप्त जानकारी।

वाइन टेस्टिंग को चार भागों में बाँटा जा सकता है। रंग का आंकलन, पीने से पूर्व सुगन्ध का अनुभव, मुँह में स्वाद का अनुभव और निगलने के बाद मुँह का स्वाद। इन चारों मिला जुना अनुभव पी जाने वाली वाइन का पूर्ण स्वाद नियत करता है। वाइन का सबसे अच्छा स्वाद लेने हेतु उसका तापमान वातावरण के ताप से थोड़ा कम लगभग 5 से 18oC के बीच होना चाहिये। अक्सर वाइन टेस्टिंग सत्रों में लोग वाइन को निगलते नहीं हैं, स्वाद लेने के बाद थूक देते हैं ताकि उनका वाइन के स्वाद के बारे में निर्णय वाइन से होने वाले नशे से प्रभावित न हो। एक बार स्वाद निर्धारण के बाद अपनी पसंदीदा वाइन का आराम से लुत्फ़ उठाया जा सकता है।

वाइन का रंग दर्शन: सबसे पहले 100-150 मिली लीटर वाइन को उपयुक्त गिलास में निकालते हैं। उसके बाद उसे गिलास में थोड़ा हिलाकर उसके रंग, पारदर्शिता और गाढ़ेपन की परख करते हैं। यदि यह रेड वाइन है तो इसका रंग मरून, सुर्ख लाल, जामुनी, भूरा लाल, या ईंट के रंग सा हो सकता है। यदि यह व्हाइट वाइन है तो इसका रंग हल्का पीला, हल्का हरा, हल्का अम्बर या पूर्णतया रंगहीन हो सकता है। रंग का सर्वोत्तम परीक्षण सफेद पृष्ठभूमि पर होता है, इसलिये गिलास को सफेद टेबल क्लाथ, या नैपकिन के आगे रखकर देखा जाना चाहिये। रंग से वाइन बनाने में प्रयुक्त अंगूर की किस्म, वाइन की उम्र और उसके परिपक्वन के बारे में अनुमान लगाया जाता है। हैवी वाइन जिसमें सामान्यतः एल्कॉहल, एसिड, टैनिन और/या अर्क अधिक मात्रा में होते हैं, का रंग गहरा होता है। मीठी वाइन की श्यानता अधिक होने की वजह से गिलास में उसे हिलाने पर वह गिलास की दीवारों पर अधिक देर से फिसलती है। समय के साथ सामान्यतया सभी वाइन की पारदर्शिता / निर्मलता बढ़ती है।

वाइन की सुगन्ध: वाइन की सुगन्ध लेने का सही तरीका है कि गिलास के मुँह के पास नाक ले जाकर एक लम्बी साँस ली जाय। वाइन की सुगन्ध या अरोमा (aroma) से ओक, बेरी, फूलों, वनीला, खट्टेपन की मिली जुली महक आती है जो वाइन के स्वाद का एक महत्त्वपूर्ण पूरक अंग होता है। सुगन्ध के सभी अवयवों को परखने के लिये अक्सर कई बार वाइन की सुगन्ध ली जाती है।

वाइन का स्वाद: सुगन्ध लेने के बाद वाइन का एक छोटा घूंट मुँह में लेकर उसे जीभ की सहायता से मुँह में अच्छी तरह से हिलाते हैं जिससे कि जीभ की स्वाद संवेदी कोशिकाओं को स्वाद आंकलन के लिये उचित समय मिल सके। स्वाद संवेदन को दो चरण में बाँटा जा सकता है। प्रथम चरण, जिसे आक्रमण चरण (Attack Phase) कहते है, में वाइन की एल्कॉहल मात्रा, खट्टापन और मिठास का अनुभव होता है। एक संतुलित वाइन में इनमें से कोई भी स्वाद दूसरों पर हावी नहीं होना चाहिये। इस चरण में वाइन की जटिलता (complexity) और तीव्रता (intensity) के बारे में पता चलता है। जैसे कि वाइन लाइट है या हैवी, मीठी है या शुष्क, कड़क है या मुलायम आदि परन्तु इस चरण में वाइन मे से फलों या मसालों का स्वाद आना जरूरी नहीं है। दूसरे चरण, जिसे विकास चरण (Evolution Phase) कहते हैं, में वाइन का वास्तविक स्वाद पता चलता है। रेड वाइन में बेर, आलूबुखारा, अञ्जीर आदि फलों और कालीमिर्च, लौंग, दालचीनी आदि मसालों या ओक और देवदार की लकड़ी और धुँए की महक का अनुभव मिल सकता है। जबकि व्हाइट वाइन में सेब, नाशपाती, और खट्टे फलों के स्वाद के साथ शहद, मक्खन और जड़ी बूटियों का अनुभव मिल सकता है। इसके बाद वाइन को निगल या थूक देते हैं।

वाइन पीने के बाद मुँह का स्वाद: ये वह चरण है जब वाइन का स्वाद अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता है। इसमें यह देखा जाता है कि निगलने के बाद कितनी देर तक वाइन का स्वाद मुँह में रहता है। क्या वाइन लाइट बॉडी थी (जैसे पानी) या फिर हैवी बॉडी (जैसे दूध जैसी गाढ़ी)? क्या वाइन का स्वाद अभी भी मुँह के पिछले भाग और गले में लिया जा सकता है? क्या स्वाद देर तक मुँह में रहा या फिर कुछ पल के लिये ही रहा? वाइन की अन्तिम छाप क्या थी – फल, मक्खन या ओक? और सबसे महत्त्वपूर्ण क्या आप दूसरा घूँट लेना चाहते हैं या फिर वाइन अधिक कड़वी थी?

अन्त में इस बात का निर्धारण किया जाता है कि वाइन ने आप पर क्या छाप छोड़ी? कुल मिलाकर आपको वाइन कैसी लगी? वाइन का खट्टापन जो उसमें उपस्थित सिरके के कारण होता है, कितना था? क्या वाइन संतुलित थी? और किस प्रकार के भोजन के साथ यह अच्छी लगेगी?

इंटरनेट पर ऐसे कई लिंक ढूँढे जा सकते हैं जिसमें वाइन और भारतीय व्यंजनों के मेल के बारे में वर्णन है।

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