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स्वनिर्मित साइडर

साइडर सेब के रस से निर्मित एक एल्कॉहलीय पेय है। भारत में आजकल हिमाचल प्रदेश में इसका काफी मात्रा में उत्पादन होने लगा है और यह बियर का अच्छा विकल्प है। मेरी पिछली पोस्ट में बतायी गयी घर पर रेड वाइन बनाने की विधि में ही सेब के रस का प्रयोग करके साइडर भी बनाया जा सकता है। नीचे कुछ चित्र, मेरे द्वारा बनाये गए साइडर के हैं जो मैंने जनवरी में बनाया था और लगभग ५ माह के परिपक्वन के बाद पिछले सप्ताह इसका उपभोग किया।

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घर बैठे बनायें रेड वाइन

पिछले ६ माह में मैंने रेड (ग्रेप) वाइन और हार्ड एप्पल साइडर बनाने पर कई प्रयोग किये जो अधिकतर सफल रहे और फलस्वरूप घर पर एक सस्ती, ठीकठाक स्वाद वाली व पूर्णतया जैविक वाइन उपलब्ध हुयी। यदि कानून की बात करें तो स्वयं, परिवार एवं मित्रों के उपभोग के लिये घर पर वाइन बनाना पूर्णतः वैधानिक है, बस इसे बेचा नहीं जा सकता है उसके लिये आबकारी विभाग से लाईसेंस लेने की आवश्यकता होती है। गुणवत्ता के मामले में ये वाइन भारतीय बाजार में उपमब्ध किसी भी रु ३००/७५० मिली और यूरोपियन बाज़ार में उपमब्ध किसी भी ४ यूरो/७५० मिली से सस्ती वाइन से बेहतर होती है। तो आइये जानते हैं इसे बनाने कि अपेक्षाकृत सरल और सुविधाजनक विधि:-

आवश्यक सामग्री: ट्रॉपिकाना १००% रेड ग्रेप जूस (४ लीटर), ताजा अंगूर (२५० ग्राम), चीनी या शहद (४०० ग्राम), एक अच्छी तरह से बंद हो सकने वाला प्लास्टिक का जरीकेन (५ लीटर)
अन्य वैकल्पिक सामग्री: रेड वाइन यीस्ट, वाइन कार्बोय
किण्वन समय: २ से ३ सप्ताह
परिपक्वन समय: २ से ६ माह
तैयार रेड वाइन: ४ लीटर
एल्कोहॉल प्रतिशत: १० से १२ % (विशिष्ट घनत्व द्वारा अनुमानित परिमाण)
लागत: ७० से १०० रु प्रति ७५० मिली लीटर

यहाँ बताई गयी विधि का उद्देश्य सर्वश्रेष्ठ वाइन नहीं बल्कि सबसे आसानी से बनाई जा सकने वाली औसत वाइन है। अंगूर को मसलकर उससे रस निकालने की झंझट से बचने के लिये एक सरल उपाय है कि बाजार में उपलब्ध परिष्कृत रेड ग्रेप जूस (जैसे ट्रॉपिकाना, रियल, फ्रेशगोल्ड आदि) प्रयोग किया जाय। यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि जूस में कोई भी प्रिज़र्वेटिव नहीं मिला हो और अच्छे परिणाम के लिये १००% फ्रूट जूस ही प्रयोग करें। सामान्यतया जूस में १५० से १६० ग्राम प्रति लीटर शर्करा होती है। जबकि किण्वन के फलस्वरूप पर्याप्त मात्रा में एल्कोहॉल बनने के लिये मातृद्रव में शर्करा की मात्रा लगभग २५० ग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए। इसकी आपूर्ति जूस में उपयुक्त मात्रा में चीनी या शहद मिला कर पूरी की जा सकती है। प्रयोग में लाई जाने वाली सभी वस्तुओं की सफाई का ध्यान देने की विशेष आवश्यकता होती है। इसके लिये पूरे प्रक्रम में केवल स्वच्छ जल (आर. ओ. वाटर यदि उपलब्ध हो तो) प्रयोग में लायें। सर्वप्रथम सभी बर्तनों को गर्म पानी से धो लें। तत्पश्चात ४ लीटर जूस और ४०० ग्राम चीनी या शहद को ५ ली के प्लास्टिक के जरीकेन में डालकर अच्छी तरह से हिलाए ताकि शर्करा भली भाँति घुल जाय। शहद यद्यपि चीनी से महंगा होता है परन्तु अपेक्षाकृत बेहतर वाइन बनाता है। अब इसमें यदि उपलब्ध हों तो वाइन यीस्ट अथवा कुछ ताजे धुले हुये अंगूर मसलकर कर दाल दें और एक बार फिर से अच्छी तरह से हिलायें। अंगूर की खाल में जंगली यीस्ट होता है जो कि रस के किण्वन में भाग लेता है। इसके बाद जरीकेन को अच्छी तरह से बंद कर दें ताकि हवा अंदर न जा सके; साथ ही इस बात का भी ध्यान रखें कि किण्वन के फलस्वरूप बनाने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड धीरे धीरे रिस कर बाहर निकल सके। किण्वन के लिये उपयुक्त तापमान १८ से २४ डिग्री सेंटीग्रेड होता है अतः पात्र को अँधेरे व ठन्डे स्थान पर किण्वन के लिये रख दें। २ से ४ दिन के भीतर किण्वन शुरू हो जाता है और कार्बन डाई ऑक्साइड के बुलबुले और द्रव सतह पर उपस्थित झाग देखा जा सकता है। हर २-३ दिन में पात्र का अवलोकन करते रहें और यह सुनिश्चित कर लें कि कार्बन डाई ऑक्साइड गैस बाहर निकल पा रही है। करीब ३ सप्ताह में गैस के बुलबुले दिखना बंद हों जाते हैं और उसके करीब १ सप्ताह बाद यानि कुल १ माह के बाद प्राथमिक किण्वन संपन्न हो जाता है। अब वाइन को प्लास्टिक के पात्र से साइफन द्वारा निकाल कर (ताकि नीचे बैठा अवसाद विचलित न हो) काँच की बोतलों में परिपक्वन के लिये रखा जा सकता है। किण्वन के दौरान बना एल्कोहॉल परिपक्वन के समय वाइन में बची शर्करा व अन्य अवयवों से घुल मिलकर एक अच्छी वाइन को जन्म देता है। परिपक्वन के लिये भी सामान ठन्डे और अँधेरे वातावरण का प्रयोग करना चाहिए। परिपक्वन का समय न्यूनतम २ माह से अधिकतम ६ माह तक हो सकता है। इससे अधिक समय तक परिपक्वन से वाइन के ऑक्सीकरण का खतरा रहता है जिसके फलस्वरूप वाइन सिरके (Vinegar) में परिवर्तित होने लगती है और पीने योग्य नहीं बचती। नीचे दिए गए चित्र में किण्वन पात्र और परिपक्वन के रखी गयी बोतलें देखी जा सकती हैं।

किण्वन और परिपक्वन के पश्चात तैयार वाइन के उपभोग से पूर्व एक और गुणवत्ता परीक्षण की आवश्यकता है। सर्वप्रथम इसे सूंघकर देखें कि इसमें से वाइन की ही महक आ रही है अन्य कोई तीखी, आपत्तिजनक या सड़न की नहीं। यदि सब ठीक है तो फिर इसका स्वाद लेकर देखें। सामान्यतः होने वाली कमियों में से प्रमुख हैं वाइन का अधिक मीठा होना, अधिक खट्टा होना या खराब स्वाद होना। वाइन अधिक मीठी होने का कारण है किण्वन पूरा होने से पूर्व ही यीस्ट निष्क्रिय हों जाना, इस वाइन को पीने योग्य बनाने के लिये इसमें स्वच्छ जल मिलायें। वाइन के खट्टे होने का कारण इसका ऑक्सीकरण है जिससे बचने के लिये सम्पूर्ण प्रक्रम में वाइन के वायु से संपर्क को न्यूनतम रखना चाहिए। स्वाद खराब होने का अर्थ है कि किण्वन के दौरान यीस्ट के अतिरिक्त अन्य बैक्टीरिया भी पनपने लगा है, इससे बचने कि लिये सफाई का विशेष ध्यान रखने की जरूरत होती है।

स्वादिष्ट पकवान बनाने की भाँति ही वाइन बनाना भी एक कला है जिसमें महारथ पाने के लिये कई प्रयोग और सतत रूचि एवं विश्वास की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार रेसेपी पढ़ कर सभी लोग एक बार में शेफ नहीं बन जाते उसी प्रकार वाइन बनाने में भी पारंगत पाने के लिये कई प्रयास करने होते हैं। सफलता की कुंजी हैं रूचि, लगन और विश्वास। इसी विधि के प्रयोग से अन्य बिना खट्टे (non-citrus) फलों जैसे सेब, नाशपाती, आलूबुखारा, बेर, आड़ू, लीची इत्यादि की वाइन भी बनाई जा सकती है।

यदि सबकुछ ठीकठाक रहा तो आपकी पहली वाइन आपको मुबारक। 🙂

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म्यूनिख शहर और यहाँ की बियर

म्यूनिख (Munich or München) दक्षिण जर्मनी का सबसे बड़ा शहर और बवेरिया (Bavaria or Bayern) प्रदेश की राजधानी है। एक प्रमुख औद्योगिक नगर होने के साथ ही यह दुनिया के सबसे बड़े बियर उत्सव ओक्टोबर्फेस्ट (Oktoberfest) के लिए भी जाना जाता है। सितम्बर और अक्टूबर माह में होने वाले इस उत्सव में दुनिया भर से करीब ५० से ६० लाख लोग इस उत्सव के लिये बनाई गई विशिष्ट बियर का आनंद लेने यहाँ आते हैं। इसी कारण से इसे विश्व की बियर राजधानी (beer capital of the world) भी कहा जाता है। गत माह मैं करीब एक सप्ताह के लिए म्यूनिख गया था जिससे मुझे वहाँ की बियर और संस्कृति के बारे बहुत कुछ जानने को मिला, तो आइये इस पोस्ट में प्रस्तुत है म्यूनिख बियर (Münchener Bier) की कुछ ख़ास बातें।

जर्मनी और ख़ासकर बवेरिया में बियर लगभग सभ्यता जितनी ही पुरानी है। यहाँ की कई ब्र्यूवरी ५०० से अधिक वर्ष पुरानी हैं, और कुछ तो ८०० से लगभग १००० वर्ष। औद्योगिक स्तर पर बड़ी मात्रा में बनाई जाने वाली लागर (lager) बियर से सम्बंधित बहुत से अन्वेषण और प्रक्रम विकास कार्य म्यूनिख के आसपास की ब्र्यूवरी और युनिवर्सिटी में ही हुये। यहाँ पर मुख्यतः लागर बियर ही बनाई जाती है और बियर में भिन्नता और अनूठापन लाने के बजाय एक लगभग नियत अच्छे स्वाद और मात्रा पर अधिक ध्यान दिया जाता है। इसीलिये यहाँ के बार और रेस्त्राँ में १ लीटर या आधा लीटर के बियर मग ही देखने को मिलते हैं। बियर बोतल भी ३३० मिली के बजाय ५०० मिली की होती है। बियर में एल्कोहॉल प्रतिशत सामान्यतः लगभग ५ से ६ के बीच होता है जबकि ओक्टोबर्फेस्ट के लिये बनायी जाने वाली बियर लगभग २% अधिक सशक्त होती है। इसके अतिरिक्त म्यूनिख अपने विशाल बियर गार्डन (Biergarten) और बियर हॉल के लिये भी जाना जाता है जिनकी प्राचीन काल से जनसभाओं और जन आन्दोलन में एक प्रमुख भूमिका रही है। हिटलर के नेतृत्व में नाज़ी पार्टी द्वारा १९२३ में किया गया असफल विद्रोह जो कि इतिहास में बियर हॉल पुच (Beer Hall Putsch) के नाम से जाना जाता है यहीं के एक बियर हॉल बर्गरब्राऊकेलर (Bürgerbräukeller) में हुआ था जो कि अब अस्तित्व में नहीं है। हौफ़ब्रौहौस (Hofbräuhäus) एक और बियर गार्डन है जोकि विश्व में सबसे प्रसिद्द बियर हॉल कहा जाता है। आजकल म्यूनिख के अतिरिक्त अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इटली आदि कई अन्य देशों में इसकी शाखाएं हैं। म्यूनिख शहर में लगभग आधा दर्जन बड़ी ब्र्यूवरी हैं और सभी में एक बियर गार्डन/हॉल है। यहाँ की प्रमुख ब्र्यूवरी हैं: ऑगस्टीनरब्राऊ (Augustiner Bräu), हौफ़ब्राऊ (Hofbräu), पॉलनर (Paulaner), लोवेनब्राऊ (Löwenbräu), हैकर-शुर्र (Hacker-Pschorr) और स्पाटेन-फ्रैन्जिस्कनर ब्राऊ (Spaten-Franziskaner-Bräu)। यही ब्र्यूवरी अपने विशालकाय टेन्ट ओक्टोबर्फेस्ट में लगाती हैं जिनमें उत्सव के लिये बनाई गयी विशिष्ट बियर पी जा सकती है। इसके अलावा कुछ अन्य प्रमुख बवेरियन बियर हैं: बेक्स (Beck’s), वीहनस्टेफनर (Weihenstephaner), एरडिंगर (Erdinger), क्रौंबाकर (Krombacher) और ऑटिन्जर (Oettinger)। इनमें से वीहनस्टेफनर संभवतः विश्व की सबसे पुरानी ब्र्यूवरी है जोकि १०४० इसवी से लगातार कार्यरत है। आजकल यह तकनीकी युनिवर्सिटी म्यूनिख (Technische Universität München, Weihenstephan) का एक भाग है और बियर उत्पादन प्रक्रम के विकास के लिये होने वाले अनुसंधानों के लिये जानी जाती है।

लगभग सभी ब्र्यूवरी प्रमुख बवेरियन स्टाइल बियर बनाती हैं जिनमे मुख्य हैं:

पिल्स (Pils) या पिल्ज्नर (Pilsner): सबसे अधिक मात्रा में बनाने वाली हल्के रंग की बियर जोकि चेक गणराज्य की पिल्ज्नर बियर की प्रतिरूप है।
हेल (Hell) या हेलस (Helles): जर्मन में हेलस का मतलब हल्का होता है, यह हल्के रंग की लागर बियर है।
डंकल (Dunkle): जर्मन में डंकल का अर्थ होता है गहरा, अतः ये भुने हुये अनाज के बनी गहरे रंग की लागर बियर है।
वेयज़ेन (Weizen): ये जौ के स्थान पर गेहूँ से बनाई जाने वाली बियर है और यहाँ की एक मात्र ऊपरी किण्वन (top fermenting) वाली बियर है। गेहूँ में भूसे की मात्रा कम होने के कारण इससे बना मातृद्रव (wort) अधिक चिपचिपा और गाढ़ा होता है अतः यह सतत बियर उत्पादन के प्रक्रम में सामान्यतः उपयुक्त नहीं माना जाता है। भूसा साथ ही बियर का स्वनिष्पंदन करके उसे पारदर्शी भी बनाने का काम करता है। इस सब के बावजूद गेहूँ की बियर के उत्पादन का कारण है इसका एक अलग ताजगी भरा स्वाद। पारदर्शी न होने के कारण इसे व्हाईट बियर (Weissbier) भी कहते हैं। हालाँकि अब नए विकसित विशिष्ट प्रक्रम से इसे छनित करके पारदर्शी भी बनाया जा सकता है।
मार्जेन (Märzen) और ऑक्टोबरफ़ेस्टबीयर (Oktoberfestbier): ये मुख्यतः उत्सव के बनाई जाने वाली बियर है जिसे अधिक समय तक रखने के उद्देश्य से या तो अधिक एल्कोहॉल या अधिक होंप्स डाल कर बनाया जाता है।
एल्कोहॉलफ्री (Alkoholfrei): जैसा कि नाम से जाहिर है, इन बियर में से किण्वन के पश्चात एल्कोहॉल निकालकर उसका प्रतिशत ०.५ % से कम के स्तर पर लाया जाता है। स्वाद गंध इत्यादि में सामान्य बियर से इनमें कोई भिन्नता नहीं होती है, और इसे कई मौकों पर जब एल्कोहॉल नहीं चाहिए होता, पिया जा सकता है जैसे कि शारीरिक श्रम या खेलने के पूर्व या तुरंत बाद और गाड़ी या अन्य भारी मशीन चलाने से पूर्व या गर्भवती महिलायें इत्यादि।

munchener bier

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