मद्यरोधी मानसिकता कितनी कारगर?

भारतीय संस्कृति मद्यपान को प्रोत्साहित नहीं करती है जोकि एक हद तक उचित और तर्कसंगत भी है। परन्तु वर्तमान परिपेक्ष में हम ये सोचें कि आखिर इस मद्यरोधी मानसिकता का वास्तव में कोई लाभ है तो कई तथ्य सामने आते हैं। मद्यपान के स्वास्थ्य पर बहुत से नकारात्मक प्रभाव होते हैं जैसे कि अधिक मात्रा में शर्करा या वसा युक्त भोजन के होते हैं। अतः मद्यपान में भी अन्य चीजों की भाँति ही नियंत्रण की आवश्यकता होती है।

पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार से हमने अपना आर्थिक विकास किया है और पाश्चात्य संस्कृति को अपनाया है उसी प्रकार से मद्यपान को भी धीरे-धीरे सामाजिक स्वीकृति मिलने लगी है। आज पार्टियों में वाइन, बियर आदि पीना आपके सामाजिक होने का प्रतिरूप बनता जा रहा है। अभी क्योंकि हम एक संक्रमण के दौर से गुज़र रहे हैं अतः बहुत से लोगों को इस संस्कृति को अपनाने में अभी कठिनाई हो परन्तु हमारे पास शायद अब कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है।

ऐसा नहीं है कि भारतीय इतिहास में मदिरा का उल्लेख नहीं है। जब देवता इसे पीते थे तो सुरा कहते थे और जब दानव तो मदिरा। इसे एक प्रकार से अपनी सुविधा कह लीजिये या फिर भ्रम। हमारा इतिहास मदिरापान को स्वीकृति देने को लेकर एकमत नहीं है।

जहाँ तक मदिरा पान और उससे जुड़ी बुराइयों की बात है तो भी जितनी दुनिया मैने देखी है उसमें मदिरा पान और व्यक्तिगत चरित्र के बीच कोई सम्बन्ध स्थापित करना लगभग उतना ही आधारविहीन है जितना कि जाति या धर्म से व्यक्ति के चरित्र का निर्धारण। अर्थात प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदिरा पान आपके चरित्र को प्रभावित नहीं करता। मदिरा पान के कारण स्नायु तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव से कई बार व्यक्ति अन्तर्निहित भावनाओं को प्रकट कर देता है। परन्तु इसे मदिरा पान के दुष्प्रभाव के रूप में देखना गलत है।

भारत में आज यदि देखें तो सम्भवतः पंजाब और केरल में सबसे अधिक मदिरा पी जाती है परन्तु साक्षरता, समृद्धि और सामाजिक स्तर की दृष्टि से ये दोनों ही प्रदेश अन्य प्रदेशों की तुलना में आगे हैं। भारत में अन्य देशों की तुलना में मदिरा पर काफ़ी अधिक कर लगाया जाता है और कई प्रदेशों में नशाबन्दी भी है। परन्तु यह मेरे विचार से यह किसी भी मदिरा पीने वाले को रोकने में अक्षम है, हाँ शायद आर्थिक तंगी की वजह से लोग सस्ती मदिराओं का पान करने लगें।

अन्त में मैं यही कहूँगा कि मदिरा पीना या न पीना एक व्यक्तिगत निर्णय है जो कि समझबूझ कर लेना चाहिये। नियम कानून बनाकर केवल तस्करी, कालाबाजारी और दूषित मदिरा उत्पादन को ही बढ़ावा मिलता है। पिछले 15 वर्षों में हमने खुले बाज़ार से अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत किया है तो मदिरा बाज़ार को भी मुक्त करके देखना चाहिये। मेरा विश्वास है कि इसके सकारात्मक परिणाम ही सामने आ सकते हैं।

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4 टिप्पणियाँ

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4 responses to “मद्यरोधी मानसिकता कितनी कारगर?

  1. कितना ही प्रतिबंध हो रुके न मदिरापान।
    बतलाया जो आपने अलग है उसका मान।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

  2. हम भी सुरा ही कहते हैं. 🙂

    अच्छा आलेख.

  3. पता नहीं मदिरापान को लेकर आपका या अन्य विशेषज्ञों का क्या अनुभव है पर इस लेखक का दावा है कि
    1. नियमित मद्यपान करने वाले विश्वसनीय नहीं होते क्योंकि जब उनका समय पीने का होता है तब वह केवल उसके बारे में सोचते हैं और नहीं होता तब भी उसका विचार करते हैं। ऐसे में वह वादा कर पूरा नहीं करते।
    2.नियमित मद्यपान व्यक्ति को शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर करता है।
    3.इस लेखक से नियमित मद्यपान करने वाले एक व्यक्ति ने कहा था कि
    ‘शराबी कभी विश्वसनीय नहीं होते चाहे वह स्वयं ही क्यों न हो?’
    दीपक भारतदीप

  4. सर्वप्रथम तो इस लेख का उद्देश्य मदिरापान को प्रोत्साहित करना नहीं था। यह सर्वविदित तथ्य है कि अधिक मदिरापान के शारीरिक और मानसिक कुप्रभाव होते हैं, पर क्या वर्तमान समाज की मद्यरोधी मानसिकता इसे रोकने में या कम करने में सफल रही है? हाँ शायद खुले आम के बदले लोग चोरी-छिपे पीने लगे हों। और जहाँ तक आपका दावा है कि एक मदिराभोगी विश्वसनीय नहीं होता तो उस हिसाब से यूरोपीय देशों में जीवन विश्वास के बिना ही चलता होगा। दरअसल मदिराभोगी लोगों के बारे में यह सोचना एक हद तक पूर्वाग्रह से ग्रसित है। क्योंकि हमें यह भी देखना चाहिये कि वह व्यक्ति जब मदिरापान नहीं करता था तब क्या वह विश्वसनीय था। खैर मैं मदिराभोगियों की और पैरवी नहीं करना चाहता बस इतना ही कहूँगा कि मदिरा किसी भी समस्या का समाधान नहीं करती है जैसे कि दूध या कोई अन्य खाद्य पदार्थ नहीं करता (इस सन्दर्भ में भूख को एक समस्या न माना जाय)। लोग मानसिक, आर्थिक और सामाजिक विषाद को कम करने के लिये मदिरा पान करते हैं और उनकी असफलता का दोष मदिरा पर मढ़ दिया जाता है।

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