Monthly Archives: मई 2009

बियर की गुणवत्ता के मात्रक

वाइन और आसवित मदिरा (या लिकर) के स्वाद और सुगंध के आंकलन की जटिल विधि के विपरीत बियर गुणवत्ता मुख्यतः उसके रंग और स्वाद में कड़वेपन को नापकर निर्धारित की जाती है। बियर के रंग का आंकलन एक प्रकार के स्पेक्ट्रोमीटर से किया जाता है और इसे स्टैंडर्ड रेफरेन्स मेथड (Standard Reference Method/ SRM), यूरोपियन ब्र्यूवरी कन्वेन्शन (European Brewery Convention/ EBC) या डिग्री लॉविबॉन्ड (Degrees Lovibond/ o L) में नापते हैं। जबकि स्वाद का आंकलन बियर के कड़वेपन के निर्धारण से होता है, जिसे इंटरनेशनल बिटरनेस यूनिट (International Bitterness Unit/ IBU) में नापते हैं।

स्टैंडर्ड रेफरेन्स मेथड (Standard Reference Method/ SRM):
यह स्पेक्ट्रोफोटोमीटर के प्रयोग से बियर के रंग के वस्तुनिष्ठ निर्धारण की विधि है। इसमें बियर को एक आधा इंच के पारदर्शी कप में रख कर उससे 430 नैनोमीटर तरंग दैर्ध्य का गहरा नीला प्रकाश उस पर डालते हैं और प्रकाश के अवशोषण को नापते हैं। 430 नैनोमीटर का प्रकाश बियर के रंगों में भिन्नता दर्शाने के लिये सबसे उपयुक्त होता है। बियर का रंग डिग्री एस आर एम ( o SRM) में नापने के लिये निम्नलिखित फार्मूला प्रयोग करते हैं –

o SRM = – 10. log10(I/Io)

जहाँ Io आपतित प्रकाश की तीव्रता तथा I संचरित प्रकाश की तीव्रता है। अर्थात किसी रंगहीन द्रव जिससे पूरा प्रकाश संचरित हो जाता है, के लिये I = Io, अतः o SRM = 0 (क्योंकि log10 1 = 0)। इसी प्रकार पूर्णतया अपारदर्शी द्रव के लिये I = 0 अतः o SRM = अनन्त (क्योंकि log10 0 = – अनन्त)। यदि 20% प्रकाश संचरित होता है तो I/Io= 0.2 और o SRM = 7। o SRM को निकटतम पूर्णांक में ही प्रदर्शित करते हैं। सामान्यतः बियर का o SRM 2 से 70 तक होता है।

इंटरनेशनल बिटरनेस यूनिट (International Bitterness Unit/ IBU):
IBU पैमाने का प्रयोग बियर के कड़वेपन के आंकलन में किया जाता है जिसे स्पेक्ट्रोफोटोमीटर और सॉल्वेंट एक्सट्रैक्शन विधि से नापते हैं। बियर में कड़वापन उसमे उपस्थित हॉप्स (Hops) के कारण होता है जिसे बियर में उपस्थित माल्ट के स्वाद को सन्तुलित करने के लिये मिलाया जाता है। हॉप्स में एल्फ़ा एसिड (Alpha acids) की मात्रा यह निर्धारित करती है कि वास्तव में हॉप्स का कितना स्वाद (कड़वापन) बियर में स्थानान्तरित होता है। अतः बियर का IBU निर्धारित करने के लिये बियर उत्पादक निम्नलिखित फार्मूला प्रयोग करते हैं –

IBU = Wh × AA% × Uaa ⁄ ( Vw × 1.34 )

जहाँ Wh हॉप्स की मात्रा (आउन्स में), AA% हॉप्स में उपस्थित एल्फ़ा एसिड का प्रतिशत, Uaa प्रयुक्त एल्फ़ा एसिड का प्रतिशत और Vw बियर के मातृ द्रव का कुल आयतन (गैलन में) है। सामान्यतः बियर का IBU 5 से 100 तक होता है।

अधिकतर बियर उत्पादक इस सूचना को अपने तक ही सीमित रखते है और अपने ब्राँड में नियमितता लाने हेतु प्रयोग करते हैं।

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मद्यरोधी मानसिकता कितनी कारगर?

भारतीय संस्कृति मद्यपान को प्रोत्साहित नहीं करती है जोकि एक हद तक उचित और तर्कसंगत भी है। परन्तु वर्तमान परिपेक्ष में हम ये सोचें कि आखिर इस मद्यरोधी मानसिकता का वास्तव में कोई लाभ है तो कई तथ्य सामने आते हैं। मद्यपान के स्वास्थ्य पर बहुत से नकारात्मक प्रभाव होते हैं जैसे कि अधिक मात्रा में शर्करा या वसा युक्त भोजन के होते हैं। अतः मद्यपान में भी अन्य चीजों की भाँति ही नियंत्रण की आवश्यकता होती है।

पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार से हमने अपना आर्थिक विकास किया है और पाश्चात्य संस्कृति को अपनाया है उसी प्रकार से मद्यपान को भी धीरे-धीरे सामाजिक स्वीकृति मिलने लगी है। आज पार्टियों में वाइन, बियर आदि पीना आपके सामाजिक होने का प्रतिरूप बनता जा रहा है। अभी क्योंकि हम एक संक्रमण के दौर से गुज़र रहे हैं अतः बहुत से लोगों को इस संस्कृति को अपनाने में अभी कठिनाई हो परन्तु हमारे पास शायद अब कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है।

ऐसा नहीं है कि भारतीय इतिहास में मदिरा का उल्लेख नहीं है। जब देवता इसे पीते थे तो सुरा कहते थे और जब दानव तो मदिरा। इसे एक प्रकार से अपनी सुविधा कह लीजिये या फिर भ्रम। हमारा इतिहास मदिरापान को स्वीकृति देने को लेकर एकमत नहीं है।

जहाँ तक मदिरा पान और उससे जुड़ी बुराइयों की बात है तो भी जितनी दुनिया मैने देखी है उसमें मदिरा पान और व्यक्तिगत चरित्र के बीच कोई सम्बन्ध स्थापित करना लगभग उतना ही आधारविहीन है जितना कि जाति या धर्म से व्यक्ति के चरित्र का निर्धारण। अर्थात प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मदिरा पान आपके चरित्र को प्रभावित नहीं करता। मदिरा पान के कारण स्नायु तंत्र पर पड़ने वाले प्रभाव से कई बार व्यक्ति अन्तर्निहित भावनाओं को प्रकट कर देता है। परन्तु इसे मदिरा पान के दुष्प्रभाव के रूप में देखना गलत है।

भारत में आज यदि देखें तो सम्भवतः पंजाब और केरल में सबसे अधिक मदिरा पी जाती है परन्तु साक्षरता, समृद्धि और सामाजिक स्तर की दृष्टि से ये दोनों ही प्रदेश अन्य प्रदेशों की तुलना में आगे हैं। भारत में अन्य देशों की तुलना में मदिरा पर काफ़ी अधिक कर लगाया जाता है और कई प्रदेशों में नशाबन्दी भी है। परन्तु यह मेरे विचार से यह किसी भी मदिरा पीने वाले को रोकने में अक्षम है, हाँ शायद आर्थिक तंगी की वजह से लोग सस्ती मदिराओं का पान करने लगें।

अन्त में मैं यही कहूँगा कि मदिरा पीना या न पीना एक व्यक्तिगत निर्णय है जो कि समझबूझ कर लेना चाहिये। नियम कानून बनाकर केवल तस्करी, कालाबाजारी और दूषित मदिरा उत्पादन को ही बढ़ावा मिलता है। पिछले 15 वर्षों में हमने खुले बाज़ार से अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत किया है तो मदिरा बाज़ार को भी मुक्त करके देखना चाहिये। मेरा विश्वास है कि इसके सकारात्मक परिणाम ही सामने आ सकते हैं।

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