मदिरा उत्पादन: एक जैव रासायनिक दृष्टिकोण

मदिरा उत्पादन की सबसे महत्त्वपूर्ण और अभिन्न प्रक्रिया है किण्वन या फर्मन्टेशन (fermentation)। इस प्रक्रिया में कुछ कवक, जिन्हें यीस्ट (खमीर) कहते हैं, शर्करा, ग्लूकोज़, फ्रक्टोज़, स्टार्च आदि बड़े अणुओं को वायु की अनुपस्थिति में अपघटित करके एल्कॉहल बनाते हैं। इस प्रक्रिया में कार्बन डाई ऑक्साइड गैस निकलती है जिसे या तो मदिरा से निकल जाने देते हैं या फिर यदि मदिरा को कार्बोनेटेड (सोडे या कोल्ड-ड्रिंक की भाँति) रखना है तो किण्वन पात्र को बन्द करके रखते हैं उदाहरणार्थ बियर और स्पार्कलिंग वाइन में कार्बन डाई ऑक्साइड मिली रहती है। अंगूर की खाल में प्राकृतिक रूप से यीस्ट पाया जाता है जिसे जंगली यीस्ट (wild yeast) कहते हैं। किण्वन से बना एल्कॉहल यीस्ट की सेहत के लिये अच्छा नहीं होता और द्रव में एल्कॉहल के एक नियत प्रतिशत से अधिक हो जाने पर यीस्ट जीवित नहीं रह सकता। यह नियत प्रतिशत बेकिंग यीस्ट के लिये 4 – 6%, अंगूर की खाल में पाये जाने वाले जंगली यीस्ट के लिये 12 – 16% और कुछ विशिष्ट यीस्ट के लिये 20 – 25% तक हो सकता है। अतः किण्वन से अधिकतम 25% एल्कॉहल की मदिरा बनाना ही सम्भव है। मदिरा में इससे अधिक एल्कॉहल के लिये उसका आसवन करना पड़ता है।

आसवन या डिस्टिलेशन (distillation) प्रक्रिया में विभिन्न क्वथनांक वाले द्रवों के मिश्रण से उनको पहले वाष्पित करके और फिर द्रवित करके पृथक किया जाता है। किण्वन के पश्चात प्राप्त मदिरा में 10 से 15 प्रतिशत एल्कॉहल (एथाइल एल्कॉहल या एथेनॉल) (क्वथनांक 78.4 डिग्री सेन्टीग्रेड) और शेष जल (क्वथनांक 100 डिग्री सेन्टीग्रेड) होता है। गर्म करने पर एल्कॉहल पानी की अपेक्षा अधिक मात्रा में वाष्पित होता है। इस प्रकार आसवन के हर चरण में प्राप्त द्रव में एल्कॉहल की मात्रा पहले से 10 से 20 प्रतिशत तक अधिक रहती है। सामान्यतः कई बार आसवन करके मदिरा में एल्कॉहल की मात्रा को बढ़ाया जाता है। जितनी अधिक बार आसवन किया जाता है, मदिरा की गन्ध और स्वाद कम होते जाते हैं और एल्कॉहल की मात्रा बढ़ती जाती है। इसीलिये जहाँ व्हिस्की, ब्रांडी और डार्क रम का केवल दो बार आसवन करते हैं वहीं वोडका और लाइट रम को तीन से पाँच बार आसवित किया जाता है। सामान्य आसवन से एल्कॉहल की मात्रा 95% तक बढ़ायी जा सकती है। 95% एल्कॉहल को 190 प्रूफ ग्रेन स्पिरिट या न्यूट्रल ग्रेन स्पिरिट (neutral grain spirit) कहते हैं। 95.6% एल्कॉहल और 4.4% पानी मिलकर एज़ियोट्रॉप (एक ही ताप पर उबलने वाला मिश्रण) बनाते हैं जो 78.1 डिग्री सेन्टीग्रेड पर उबलता है अतः सामान्य आसवन से इन्हें अलग नहीं किया जा सकता। 40-43% प्रतिशत एल्कॉहल की मदिरा बिना कुछ मिलाये पीने योग्य होती है परन्तु इससे अधिक एल्कॉहल वाली मदिरा पीने के योग्य नहीं होती यद्यपि उसे कॉकटेल में मिलाकर पिया जा सकता है। इसी कारण से अधिकतर आसवित मदिरायें 40-43% एल्कॉहल के साथ मिलती हैं।

इसके अलावा विभिन्न मदिराओं के उत्पादन में कुछ और भौतिक क्रियायें जैसे निस्पन्दन (filtration), परिपक्वन (aging) आदि प्रयोग की जाती हैं जिनका मुख्य उद्देश्य मदिरा के स्वाद में वृद्धि करना और उसकी दुर्गन्ध से मुक्ति पाना है। उदाहरण के लिये चारकोल (लकड़ी का कोयला) से छानकर मदिरा की गन्ध को एक हद तक कम किया जा सकता है।

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