Monthly Archives: जनवरी 2009

मदिरा की उचित मात्रा

एक बार में परोसी जाने वाली मदिरा की मात्रा कई बातों पर निर्भर करती है जैसे मदिरा का प्रकार, प्रयोजन, भौगोलिक वातावरण, सरकारी विनियम और स्वास्थ्य। साधारण तौर पर एक बार में दी जाने वाली मदिरा, जिसे एक यूनिट या एक सर्विंग कहते हैं, में 25 मिली लीटर से अधिक शुद्ध एल्कॉहल नहीं होना चाहिये। इस हिसाब से एक यूनिट में लगभग 500 मिली लीटर बियर (5% ABV1), 200 मिली लीटर वाइन (12.5% ABV) और 60 मिली लीटर आसवित मदिरा जैसे व्हिस्की, वोडका, ब्रांडी आदि (43% ABV) आती है। अमेरिका में एक यूनिट मदिरा में 0.6 आउन्स (17.75 मिली लीटर) एल्कॉहल होना चाहिये जबकि इंगलैंड में यह सीमा 10 मिली लीटर है। भारत में एक यूनिट, जिसे पेग (peg) भी कहा जाता है, में 20 मिली लीटर एल्कॉहल होता है अर्थात 350 मिली लीटर बीयर (8% ABV), 160 मिली लीटर वाइन और 45 मिली लीटर आसवित मदिरा। सामान्यतः शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ्य व्यक्ति दिन में 1 से 2 यूनिट मदिरा बिना किसी खास दुष्प्रभाव के पी सकता है।

__________

1ABV == Alcohol by Volume, एल्कॉहल का आयतन प्रतिशत

Advertisements

3 टिप्पणियाँ

Filed under गैर वर्गीकृत

सुरा या मीड (Mead)

शहद से बनी मदिरा को सुरा या मीड (Mead) कहते हैं। क्योंकि शहद सम्भवत: मानव को ज्ञात प्रथम संतृप्त शर्करा स्रोत था अतः सुरा भी मानव द्वारा बनायी गयी सम्भवतः प्रथम मदिरा थी। ॠगवेद से लेकर प्राचीन यूनानी सभ्यताओं में इसका उल्लेख मिलता है। जहाँ प्राचीन काल में लगभग सभी सभ्यताओं में यह बहुत प्रचलित थी वहीं आज इसका चलन बहुत ही कम केवल नाम मात्र को रह गया है। इसका एक कारण शहद की प्रचुर मात्रा में अनुपलब्धता भी है। आज अधिकतर लोग इसे घर में ही बनाते हैं जोकि अपेक्षाकृत काफी सरल भी है। इसे बनाने के लिये शहद को पानी में घोलकर इसका किण्वन कराते हैं और अक्सर स्वाद वृद्धि के लिये इसमें मसाले और कुछ फल मिलाये जाते हैं। यह एक प्रकार की वाइन ही है जिसमें एल्कॉहल 10 से 18 प्रतिशत तक हो सकता है।

घर पर सुरा बनाने की विधि

आवश्यक सामग्री: शहद (2 कप), मीड यीस्ट (1 चम्मच), शुद्ध जल (8 कप), नींबू (2 नींबू का रस), स्वादानुसार मसाले (अदरक, लौंग, इलाइची, दालचीनी, जायफल आदि)

सर्वप्रथम मीड या वाइन यीस्ट को 1/4 कप शहद, 1 कप शुद्ध जल और 2 नींबू के रस के मिश्रण में अच्छी तरह से मिलाकर किसी बड़े मुँह के जार में 24 घंटे के लिये छोड़ दें। जार को बन्द न करें केवल किसी साफ कपड़े से ढक दें। ऐसा करने से यीस्ट ऑक्सीजन की उपस्थिति में अपनी जनसंख्या बढ़ाता है और नींबू का रस अम्लीय वातावरण बनाता है ताकि अन्य बैक्टीरिया न पनप सकें। अगले दिन शेष शहद और पानी को मिलाकर उबालें और अच्छी तरह से मिलने दें। ऊपर आये झाग को हटाते रहें इसमें शहद में उपस्थित वैक्स होता है। जब यह मिश्रण बिल्कुल साफ हो जाय इसे ठंडा होने दें। अब इसमें यीस्ट का मिश्रण और स्वादानुसार मसाले मिलाकर किण्वन के लिये विशिष्ट वाइन कारबॉय में रख दें। इस जार में ऐसी व्यवस्था होती है कि किण्वन के समय बनने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड गैस तो इससे बाहर निकलती रहती है परन्तु बाहर की ऑक्सीजन अन्दर नहीं जा पाती। ऑक्सीजन की उपस्थिति में यीस्ट एल्कॉहल नहीं बनाता है। 2 से 3 माह में किण्वन पूरा हो जाता है।

विस्तार में जानकारी के इस लिंक पर जायें।

5 टिप्पणियाँ

Filed under मदिराओं के प्रकार

साइडर (Cider)

साइडर सेब के रस से बना एल्कॉहलीय या बिना एल्कॉहलीय पेय है। अमेरिका सहित कई देशों में एल्कॉहलीय साइडर को हार्ड साइडर कहते हैं। सेब के अतिरिक्त इसे बनाने में कभी कभी नाशपाती (Pear) का भी प्रयोग किया जाता है और इससे बने साइडर को पियर साइडर (Pear Cider) या पेरी (Perry) कहा जाता है। बिना एल्कॉहल का साइडर केवल सेब या सेब और नाशपाती के मिश्रण का प्रसंस्कृत रस (processed juice) होता है। एल्कॉहलीय साइडर सेब के रस के किण्वन से बनाया जाता है और इसमें 3 से 8 प्रतिशत तक एल्कॉहल होता है। साइडर इंग्लैंड सहित पश्चिमी यूरोपीय देशों में अधिक प्रचलित है। इसे बनाने के लिये कई विशेष प्रकार के मीठे और खट्टे सेबों के रस को मिलाया जाता है जिससे कि इसके स्वाद का अनूठापन हमेशा एक सा बना रहे और अलग अलग बैच के साइडर के स्वाद में विविधता न आये। इसका किण्वन भी सामान्य से कम ताप (5-15oC) पर किया जाता है ताकि स्वाद और महक बरकरार रहे। दिखने में ये स्पार्कलिंग वाइन या शैम्पेन की तरह लगता है।

6 टिप्पणियाँ

Filed under कॉकटेल, मदिराओं के प्रकार

जिन्जर एल (Ginger Ale)

जिन्जर एल (Ginger Ale) या जिंजर बीयर (Ginger Beer) अदरक से बना एक पेय है जिसमें बहुत कम मात्रा या न के बराबर एल्कॉहल होता है। इसका प्रयोग एक सॉफ़्ट ड्रिंक की भाँति पीने के अलावा बहुत से कॉकटेल बनाने में होता। ये बाजार में कुछ सुपर स्टोर्स में मिल सकता है। इसे बहुत ही आसानी के साथ घर पर भी बनाया जा सकता है। जिन्जर एल को अन्य खट्टे फलों (सन्तरा, अनन्नास, नींबू आदि) के रस के साथ वोडका, लाइट रम या जिन में स्वादानुसार मिलाकर पिया जा सकता है। इसके अलावा जिन्जर एल व्हिस्की में मिलाकर भी पिया जाता है।

प्रस्तुत है इसे बनाने की दो विधियाँ:

बिना एल्कॉहल का जिन्जर एल: प्राकृतिक या जैविक विधि

सामग्री – अदरक (2 बड़े चम्मच), चीनी (1 कप, 200 ग्राम), यीस्ट (1/4 चम्मच), नींबू (2 या 3), शुद्ध जल (2 लीटर)

बनाने का समय – 10 मिनट और उसके बाद 36 से 48 घंटे किण्वन के लिये

विधि – सबसे पहले दो लीटर की एक प्लास्टिक वाली सॉफ़्ट ड्रिंक की बोतल को अच्छी तरह से गर्म पानी से साफ कर लें। अब उसमें एक कप चीनी, 2 बड़े चम्मच पिसा या अच्छी तरह से कूटा हुआ ताजा अदरक, 20 से 30 मिली लीटर नींबू का रस और चौथाई चम्मच जीवित यीस्ट (बेकिंग के लिये प्रयोग होने वाला) डाल दें। अब उसमें बोतल की गर्दन तक पानी डालें और ऊपर लगभग एक से डेढ़ इंच जगह छोड़ दें। अब बोतल का ढक्कन अच्छी तरह से बन्द करके तब तक हिलायें जब तक कि चीनी घुल न जाय। अब इसे कमरे के ताप पर (18 से 28 oC) किण्वन के लिये छोड़ दें। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में किण्वन के फलस्वरूप कार्बन डाई ऑक्साइड गैस और एल्कॉहल बनता है। समय समय पर बोतल को दबाकर देखें, यदि वह दब रही है तो इसका मतलब है कि अभी और किण्वन की आवश्यकता है। यदि सब कुछ सही रहा तो 36 से 48 घंटे में 2 लीटर जिन्जर एल तैयार हो जायेगा। इसके बाद इसे फ्रिज मे रख दें जिससे कि और किण्वन रुक जाय। यह एक प्राकृतिक रूप से कार्बोनेटेड पेय है और कोल्ड ड्रिंक का अच्छा विकल्प है।

सावधानी काँच की बोतल का प्रयोग कदापि न करें क्योंकि किण्वन के फलस्वरूप बनने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड गैस से बने दबाव से उसके टूटने की प्रबल सम्भावना रहती है। यद्यपि इस विधि से बनाये गये जिन्जर एल के खराब होने की काफी कम सम्भावना है फिर भी प्रयोग की जाने वाली सभी चीजों की सफाई का ख़ास ध्यान दें क्योंकि अन्य अनुपयुक्त बैक्टीरिया भी जैविक क्रिया में भाग ले सकते हैं। इस प्रकार बने जिन्जर एल में 0.4% से कम एल्कॉहल होता है जोकि एक एल्कॉहलीय श्रेणी के पेय के लिये पर्याप्त नहीं है, परन्तु यदि आप एल्कॉहल के प्रति एलर्जिक हों या आपकी धार्मिक भावनायें किसी भी मात्रा में एल्कॉहल सेवन को निषिद्ध करती हैं तो इसका सेवन न करें।

बिना एल्कॉहल का जिन्जर एल: कृत्रिम विधि

सामग्री – अदरक (1 बड़ा चम्मच), चीनी (1 कप, 200 ग्राम), नींबू (2 या 3 नींबू) और सोडा वाटर (दो लीटर)

बनाने का समय – 30 मिनट

विधि – यदि आपके पास जिन्जर एल बनाने के लिये 2 दिन का समय न हो तो इस विधि का प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिये पतीले में 2 कप पानी लेकर उसमें एक कप चीनी और एक बड़ा चम्मच अदरक कूटकर मिलायें और 5 मिनट के लिये तेज आँच पर उबालें। अच्छी तरह से मिलायें और ठंडा होने पर उसमें नींबू का रस मिला दें। अब इसमें ठंडा सोडा वाटर मिलाके इसे पिया जा सकता है। इस प्रकार से बने जिन्जर एल में एल्कॉहल बिल्कुल नहीं होता है। स्वाद के मामले में ये जैविक जिन्जर एल से थोड़ा निकृष्ट होता है परन्तु इसे बनाने के लिये 2 दिन की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।

6 टिप्पणियाँ

Filed under कॉकटेल

देशी शराब (Country Liquor)

देशी शराब अर्थात जो शराब बड़े बड़े कारखानों और मद्यनिष्कर्षशालाओं के बजाय गाँवों में छोटे स्तर पर और उपलब्ध सीमित संसाधनों से बनाई जाती है। जहाँ एक ओर ये हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक धरोहर है वहीं दूसरी ओर सस्ती मदिरा के रूप में बहुत सी सामाजिक बुराइयों की जड़ है। यहाँ पर यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि सामान्यतया देशी शराब के ठेकों पर मिलने वाली शराब औद्योगिक स्पिरिट से बनाई जाती है और ये इस पोस्ट में बताई जाने वाली देशी शराब से भिन्न है। औद्योगिक स्पिरिट बड़े स्तर पर चीनी मिलों से जुड़ी मद्यनिष्कर्षशालाओं में शीरे से बनाया जाता है। पीये जा सकने वाले एल्कॉहल (potable alcohol) पर लगने वाले भारी करों से बचने के लिये इसमें 5% मिथाइल एल्कॉहल मिला दिया जाता है। देशी शराब के ठेकों पर इसका आसवन करके इसमें से मिथाइल एल्कॉहल अलग किया जाता है और कुछ पूरक तत्व मिलाकर इससे देशी शराब बनाई जाती है। यदि इसमें 0.3% से अधिक मिथाइल एल्कॉहल बचा रह जाता है तो शराब जहरीली होती है और इसे पीना प्राणघातक हो सकता है। इस पोस्ट में हम अनाजों, फलों और अन्य कृषि उपजों से बनाई जाने वाली मदिराओं के बारे में जानेंगे।

ताड़ी (Toddy or Arrack): ताड़ और नारियल के पेड़ से निकाले गये दूध से बनी मदिरा को ताड़ी कहते हैं। ताजी ताड़ी में एल्कॉहल नहीं होता और यह सुबह सुबह एक ऊर्जा दायक पेय के रूप में पी जाती है। 6-8 घंटों में इसमें किण्वन के फल स्वरूप एल्कॉहल बनने लगता है। इसका रंग सफेद और स्वाद कुछ कुछ मट्ठे जैसा होता है। इस प्रकार प्राप्त ताड़ी (Toddy) एक प्रकार की वाइन ही होती है जिसमें सामान्यतया 15% से कम एल्कॉहल ही होता है। इससे अधिक एल्कॉहल के लिये सागौन की लकड़ी के पीपों में इसका आसवन करके सुनहरे अम्बर के रंग की आसवित मदिरा (Arrack) भी बनाई जाती है जिसमें 30 से 50% तक एल्कॉहल होता है। भारत के अलावा ये श्रीलंका, इन्डोनेशिया और फिलीपीन्स में बनाई और पी जाती है। ताड़ी के कुछ प्रकार ब्रांडी की भाँति बनाये और बोतल बंद किये जाते हैं ये परिष्कृत और महँगे होते हैं।

फेनी (Fenny): ये काजू के फल के रस या नारियल से बनायी जाने वाली मदिरा है। गोवा की काजू फेनी प्रसिद्ध है। काजू के फल के रस का किण्वन और प्रथम आसवन के बाद प्राप्त मदिरा ताड़ी (Arrack) जैसी ही होती है। तृतीय आसवन के बाद प्राप्त मदिरा को फेनी कहते हैं। इसकी महक काफी तीव्र होती है।

महुआ (Mahuwa): महुआ या मधुका लोंगफोलिआ (Madhuca longifolia) पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड और मध्य प्रदेश में पाया जाने वाला एक जंगली पेड़ है। महुआ के फूल का प्रयोग मदिरा बनाने में किया जाता है। यह आदिवासीय क्षेत्रों में प्रचलित है और उनकी संस्कृति का एक अभिन्न अंग है। उत्सवों और प्रायोजनों में इसका सामूहिक पान किया जाता है।

हडिया (Hadia): ये बिहार, झारखण्ड, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ राज्यों में चावल से बनाई जाने वाली एक प्रकार की बियर। झारखण्ड के आदिवासीय क्षेत्रों में ये काफी प्रचलित है और आजकल उनकी आजीविका के एक प्रमुख स्रोत के रूप में सामने आया है।

4 टिप्पणियाँ

Filed under मदिराओं के प्रकार

एल्कॉहलीय प्रूफ (Alcoholic proof)

एल्कॉहलिक प्रूफ किसी एल्कॉहलिक पेय में एल्कॉहल की मात्रा निर्धारित करने का एक पैमाना है। 18वीं सदी से 1 जनवरी 1980 तक यही पैमाना मुख्यतः प्रचलन में था। यद्यपि आजकल लगभग सभी देशों में मदिरा में एल्कॉहल को आयतन प्रतिशत (Alcohol By Volume / ABV) में मापा जाता है तथापि बहुत से मदिरा उत्पादक इस पैमाने को भी साथ में प्रयोग करते हैं।

18वीं सदी के यूरोपीय मदिरा व्यापारी रम में एल्कॉहल की मात्रा जाँचने के लिये एक परीक्षण करते थे। वे थोड़े से बारूद (gunpowder) को रम से गीला करके उसे जलाकर देखते थे, यदि बारूद जल जाता था तो उस मदिरा को सत्यापित मदिरा या प्रूव्ड स्पिरिट (proved spirit) कहते थे। न्यूनतम मात्रा में एल्कॉहल वाली मदिरा जो बारूद को जलने देती है उसे 100 डिग्री प्रूफ (100 o proof) स्पिरिट कहते हैं। बाद में ये पाया गया कि इस मदिरा में एल्कॉहल का आयतन प्रतिशत 57.15% होता है जो कि लगभग 7 भाग मदिरा में 4 भाग एल्कॉहल के बराबर है। अत: 100% शुद्ध एल्कॉहल 175 डिग्री प्रूफ स्पिरिट हुआ। अर्थात किसी भी मदिरा का डिग्री प्रूफ उसमें एल्कॉहल के आयतन प्रतिशत को 1.75 से गुणा करके निकाला जा सकता है। उदाहरण के लिये 42.8% एल्कॉहल वाली मदिरा 75 डिग्री प्रूफ स्पिरिट होगी।

अमेरिका में प्रयोग होने वाले एल्कॉहलिक प्रूफ पैमाने में मदिरा के आयतन एल्कॉहल प्रतिशत को 2 से गुणा किया जाता है और इसे केवल प्रूफ स्पिरिट कहा जाता है (डिग्री का प्रयोग नहीं करते)। उदाहरण के लिये 80 प्रूफ स्पिरिट में 40% एल्कॉहल होगा।

इसके अतिरिक्त कई बार एल्कॉहल के आयतन प्रतिशत को डिग्री गेलुसाक (oGL) भी कहा जाता है। उदाहरण के लिये शिवाज़ रीगल की बोतल पर लिखे 40oGL का अर्थ है कि उसमें 40% एल्कॉहल है।

टिप्पणी करे

Filed under गैर वर्गीकृत

स्वादयुक्त मदिरा (Flavored liquor)

स्वाद और सुगन्धयुक्त मदिरा या फ़्लेवर्ड लिकर (Flavored liquor) पिछले पोस्ट में बताये गये लिकूर से भिन्न होते हैं क्योंकि इनमें चीनी नहीं या फिर काफी कम मात्रा में होती है। ये सामान्यतया रंगहीन लिकर अर्थात वोडका और लाइट रम में कुछ स्वाद और सुगन्धित फलों, मसालों, जड़ी बूटियों का सार (essence) मिला कर बनाये जाते हैं। इनमें एल्कॉहल प्रायः मूल मदिरा से 2-5% तक कम होता है।

स्वादयुक्त मदिरा के कुछ मुख्य प्रकार निम्न हैं –

एब्सिन्थ (Absinthe): ये वॉर्मवुड (wormwood) या आर्टेमीसिया एब्सिन्थियम (Artemisia absinthium), सौंफ और कुछ अन्य जड़ी बूटियों से बनाया जाता है। इसका रंग हल्का हरा होता है।

अक्वावीट (Akvavit): ये मुख्यतः स्कैन्डिनीवियन देशों में आलू या अनाज की स्प्रिट और केरावे (caraway) के बीजों से बनायी जाने वाली मदिरा है।

ऐरेक (Arak): ये पूर्वी भूमध्यसागरीय देशों (सीरिया, लेबनान, इस्रायल, जार्डन आदि) में पी जाने वाली सौंफ के स्वाद की रंगहीन मदिरा है। यूनान में बनी ऊज़ो (Ouzo) भी इसी प्रकार की मदिरा है।

जिन (Gin): ये जूनिपर बेरी (juniper berry) के स्वाद की रंगहीन मदिरा है।

राकी (Raki): ये तुर्की की सौंफ़ के स्वाद की ब्रांडी है।

जीपोरो (Tsipouro): ये यूनान (Greece) की सौंफ के स्वाद वाली पामेस ब्रांडी (अंगूर का रस निकालने के बाद बचे अवशेष से बनी ब्रांडी) है। जीकोडिया (Tsikoudia) भी एक इससे मिलती जुलती मदिरा है।

फ़्लेवर्ड वोडका (Flavored vodka): वोडका अनेकों प्रकार के विभिन्न स्वादों में मिलता है। जिनमें से प्रमुख हैं नींबू, सन्तरा, सेब, रसभरी (Raspberry), वनीला और आड़ू। इसके अतिरिक्त ये मौसमी और अन्य खट्टे फल (Citrus fruits), स्ट्रॉबेरी, ब्लूबेरी, मुनक्का, किशमिश, कॉफ़ी, चॉकलेट, अनार, आलूबुखारा, नारियल, पोदीना, आम, गुलाब, केला इत्यादि के स्वाद में भी वोडका उपलब्ध है।

फ़्लेवर्ड रम (Flavored rum): वोडका की ही भाँति लाइट रम भी अनेकों स्वादों में मिलती है जिनमें नींबू, सन्तरा, नारियल, अनन्नास, वनीला और आम प्रमुख हैं। इसके अलावा बहुत सी लाइट और डार्क रम मसालों के स्वाद में भी मिलती है।

फ़्लेवर्ड टेक़ीला (Flavored tequila): टेक़ीला नींबू, सन्तरा, आम, नारियल, अनार कॉफ़ी और हरी मिर्च के स्वाद में मिलता है।

बिटर्स (Bitters): ये जड़ी बूटियों और खट्टे फलों का एल्कॉहल और/या ग्लिसरीन में मिला पेय है। इनका प्रयोग बहुत से कॉकटेल बनाने और भोजन के बाद पीने के अलावा अनेकों दवाओं में भी होता है।

1 टिप्पणी

Filed under मदिराओं के प्रकार