व्हिस्की (Whiskey)

बियर और वाइन के विपरीत व्हिस्की एक आसवित मदिरा है जो जौ (barley), गेहूँ (wheat), मक्का (corn), राइ (rye) इत्यादि अनाजों से बनाई जाती है। सर्वप्रथम व्हिस्की आयरलैंड या स्काटलैंड में सम्भवतः पंद्रहवीं शताब्दी में बनाई गयी थी। इसकी आकस्मिक खोज के बारे में एक कहानी प्रचलित है कि बियर में एल्कॉहल प्रतिशत कम होने के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान पर काफ़ी मात्रा में पेय ले जाना पड़ता था अतः इससे बचने के लिये किसी ने सोचा कि क्यों न इसे सान्द्रित करके एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाया जाय। इसी सांद्रित द्रव ने आगे चल कर व्हिस्की का नाम लिया। वैसे आसवन इसके कई शताब्दी पूर्व से बहुत सी दवाओं के संश्लेषण में प्रयोग होता आ रहा था।

व्हिस्की मुख्यतः दो प्रकार की होती है माल्ट व्हिस्की और ग्रेन व्हिस्की। माल्ट व्हिस्की अंकुरित अनाज से बनाई जाती है। इसे बनाने के लिये पहले जौ (या अन्य कोई अनाज) को कुछ समय पानी में भिगाकर अंकुरण के लिये छोड़ देते हैं। समानता के लिये इस दौरान लगातार अनाज को उलटना पलटना पड़ता है। अंकुरण की क्रिया से पूर्व सर्वप्रथम स्टार्च से शर्करा बनती है जो कि बाद में अंकुरण हेतु भोजन का काम करती है। इससे पहले कि शर्करा अंकुरण के लिये प्रयुक्त हो इस प्रकिया को रोक देते हैं। ऐसा करने के लिये अनाज पर गर्म धूम्र प्रवाहित करके इसे सुखा देते हैं। इस धुएँ का व्हिस्की के स्वाद में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। उसके बाद इसमें एंजाइम (यीस्ट) मिलाकर इसे किण्वन के लिये रख देते हैं। किण्वन समाप्ति के बाद इसे पॉट स्टिल या कॉफ़ी स्टिल (सतत) में आसवित करते हैं। आसवन से प्राप्त द्रव को ओक की लकड़ी के बने बेलनाकार पीपों में परिपक्वन या एजिंग हेतु रख देते हैं। एक मानक व्हिस्की को न्यूनतम तीन वर्ष के लिये परिपक्वित किया जाता है। इस दौरान ओक की लकड़ी से बहुत से सुगंध और स्वाद वर्धक तत्व व्हिस्की में मिलते हैं साथ ही वाष्पन के कारण कुछ मात्रा में व्हिस्की का ह्रास भी होता है इसे देवदूतों का हिस्सा या एंजेल्स शेयर कहते हैं। अक्सर वाइन के परिपक्वन के प्रयुक्त पीपे को व्हिस्की के लिये प्रयोग में लाते हैं इससे व्हिस्की में एक विशिष्ट स्वाद आता है। परिपक्वन का समय सामान्यतः व्हिस्की की गुणवत्ता और उसके दाम को निर्धारित करता है। सामान्यतया व्हिस्की 25 से 30 वर्ष तक बेहतर होती रहती है परन्तु उसके बाद इसके गुण कम होने लगते हैं। बिना अंकुरण के अनाज से बनाई जाने वाली व्हिस्की को ग्रेन व्हिस्की कहते हैं यह पूर्णतया मशीनों के द्वारा काफ़ी मात्रा में बनने के कारण सस्ती होती है। परिपक्वन के बाद व्हिस्की को बॉटलिंग प्लांट में भेज दिया जाता है। बोतल में बन्द होने के बाद व्हिस्की का परिपक्वन रुक जाता है अर्थात अपने घर में व्हिस्की की बोतल को लम्बे समय तक रखने का कोई फ़ायदा नहीं।

माल्ट और ग्रेन व्हिस्की को कई प्रकार से मिश्रित कर के उन्हें बेचा जाता है।

वैटेड माल्ट: इसमें कई मद्यनिष्कर्षशालाओं (distilleries) से प्राप्त माल्ट व्हिस्की मिलाई जाती है। इसे प्योर माल्ट, ब्लेंडेड माल्ट या सिर्फ़ माल्ट व्हिस्की भी कहते हैं। जॉनी वाक़र ग्रीन लेबल (15 वर्ष), फ़ेमस ग्रोस (12 वर्ष) तथा इयान मेक्लायड प्रमुख प्रचलित वैटेड माल्ट व्हिस्की हैं।

सिंगल माल्ट व्हिस्की: इसमें केवल एक मद्यनिष्कर्षशाला की माल्ट व्हिस्की प्रयुक्त होती है। जब तक कि बोतल पर सिंगल कैस्क न लिखा हो, इसमें उसी मद्यनिष्कर्षशाला की अलग अलग वर्ष की माल्ट व्हिस्की मिली होती हैं। इनका नाम भी साधारणतया मद्यनिष्कर्षशाला के नाम पर ही होता है। ग्लेनलिवेट और ग्लेनफ़िडिक सबसे अधिक बिकने वाली सिंगल माल्ट व्हिस्की हैं।

ब्लेंडेड व्हिस्की: इसमें अलग अलग मद्यनिष्कर्षशालाओं की माल्ट और ग्रेन व्हिस्की मिश्रित होती हैं। यदि बोतल पर सिर्फ़ स्कॉच या आयरिश व्हिस्की लिखा हो तो सम्भवतः वह ब्लेंडेड व्हिस्की ही होगी। शिवाज़ रीग़ल, जॉनी वाक़र ब्लैक लेबल, बैलेन्टाइन्स और फ़ेमस ग्रोस कुछ प्रमुख ब्लेंडेड व्हिस्की हैं।

कैस्क स्ट्रेंथ: यह किस्म सबसे दुर्लभ होती है और केवल अच्छी अर्थात महँगी व्हिस्की ही इस रूप में मिलती हैं। इसमें पीपे (कैस्क) से निकाली गयी व्हिस्की को सीधे बिना पानी मिलाये पैक किया जाता है इसलिये इसमें एल्कॉहल प्रतिशत भी अधिक होता है।

इसके अलावा प्योर पॉट स्टिल व्हिस्की में आसवन के लिये केवल पॉट स्टिल प्रयुक्त होता है।

स्कॉटलैंड एक प्रमुख व्हिस्की उत्पादक देश है और वहाँ पर बनाई गयी व्हिस्की को स्कॉच (Scotch) कहते हैं, इसके अलावा आयरलैंड और अमेरिका और कनाडा भी व्हिस्की के प्रमुख उत्पादक हैं जहाँ की व्हिस्की को क्रमशः आयरिश व्हिस्की, अमेरिकन व्हिस्की और केनेडियन व्हिस्की कहते हैं। यहाँ पर एक ध्यान देने योग्य बात यह है कि स्कॉच और केनेडियन व्हिस्की के ऊपर व्हिस्की की स्पेलिंग Whiskey के स्थान पर Whisky लिखी होती है जिसका प्रयोग व्हिस्की की इन किस्मों के प्रमाणन में किया जा सकता है।[1]

इसमें एल्कॉहल प्रतिशत 30 से 65% तक हो सकता है, परन्तु सामान्यतया यह 40-43% होता है। भारत में निर्मित ग्रेन व्हिस्की की एक बोतल (750 ml) का दाम 200 रुपये से 1000 रुपये तक होता है जबकि एक आयातित 21 वर्ष पुरानी स्कॉच का दाम 4,000 रुपये से 10,000 रुपये या और अधिक हो सकता है। विभिन्न स्थानों पर निर्मित व्हिस्की के बारे में और अधिक जानकारी अगले पोस्ट में।

__________

[1] पहले व्हिस्की की स्पेलिंग whisky ही होती थी। परन्तु 18 वीं सदी में कॉफ़ी स्टिल के आविष्कार के बाद बाजार बहुत सी निकृष्ट स्कॉच व्हिस्कियों से भर गया। उस समय आयरिश और अमेरिकन व्हिस्की उत्पादकों ने अपनी पॉट स्टिल की व्हिस्की की उत्कृष्टता जताने के लिये उस पर एक अतिरिक्त e के साथ whiskey लिखना शुरू कर दिया।

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2 टिप्पणियाँ

Filed under मदिराओं के प्रकार, व्हिस्की

2 responses to “व्हिस्की (Whiskey)

  1. बहुत उम्दा जानकारी दी है. पीते पीते ठेलने के काम भी आयेगी. 🙂

  2. समीर जी ने मेरे लिए एक ब्‍लेक लेबल भिजवाई थी। अब मुझे भी पता चल गया कि ये ब्‍लेंडेड व्हिस्की है।

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